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जयंती योग में मनेगी जन्माष्टमी

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27 साल बाद फिर रोहिणी नक्षत्र में वृष लग्न का गोचर
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प्रभु के जन्म के समय भी यही योग था
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। श्री कृष्ण जन्माष्टमी सोमवार को है। इस रोहिणी नक्षत्र रहेगा। ज्योतिषीय दृष्टि इसे जयंती योग कहा गया है। इस अवसर पर रोहिणी नक्षत्र के साथ वृष राशि में चंद्रमा भी रहेगा। मान्यता है कि प्रभु श्रीकृष्ण के जन्म के समय भी ऐसा ही संयोग था। ऐसे में इस बार की जन्माष्टमी बेहद खास है।
ज्योतिषाचार्य सतीश मणि त्रिपाठी के मुताबिक, भाद्रपक्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त को रात 11 बजकर 25 मिनट पर होगा। अष्टमी 30 अगस्त को रात में एक बजकर 59 मिनट तक रहेगी। व्रत के लिए उदया तिथि को मानते हुए 30 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त की रात को 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। मान्यता है कि उस समय रोहिणी नक्षत्र के साथ ही वृष लग्न का गोचर था।
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ऐसे करें प्रभु का शृंगार
प्रभु के शृंगार में फूलों का खूब प्रयोग करें। पीले रंग के वस्त्र, गोपी चंदन और चंदन से शृृंगार करें। काले रंग का प्रयोग न करें। वैजयंती के फूल अगर कृष्ण जी को अर्पित किए जाएं तो सर्वोत्तम होगा। प्रसाद में पंचामृत जरूर अर्पित करना चाहिए। उसमें तुलसी दल भी जरूर डालें। मेवा, माखन और मिश्री का भोग भी लगाने के साथ-साथ धनिया की पंजीरी भी अर्पित की जाती है। पूर्ण सात्विक भोजन जिसमें तमाम तरह के व्यंजन हों, इस दिन श्री कृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।
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पंचामृत स्नान विशेष फलदायी
मध्यरात्रि को भगवान कृष्ण की धातु की प्रतिमा को किसी पात्र में रखें। उस प्रतिमा को पहले दूध, दही, शहद, शर्करा और अंत में घी से स्नान कराएं। इसी को पंचामृत स्नान कहते हैं। इसके बाद प्रतिमा को जल से स्नान कराएं। तत्पश्चात पीताम्बर, पुष्प और प्रसाद अर्पित करें। ध्यान रखें की अर्पित की जाने वाली चीजें शंख में डालकर ही अर्पित की जाएं।
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