बस्ती। इश्क-जिसे कभी जिंदगी का सबसे खूबसूरत अहसास कहा गया था, आज उसका स्वभाव बदलता जा रहा है। मेरठ की नीले ड्रम वाली मुस्कान जैसी क्रूरता भले ही न दोहराई गई हो लेकिन सनक और क्रूरता के कई नमूने लगातार सामने आ रहे हैं।
बस्ती में बुधवार-बृहस्पतिवार के बीच ऐसी ही दो वारदात सामने आने के बाद लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। शादी की दहलीज के करीब पहुंच चुके युवा इन घटनाओं से सकते में आ गए हैं। जानकार बताते हैं कि शादी व निकाह से पहले युवा होने वाली दुल्हन का ब्योरा भी खंगालने लगे हैं।
परशुरामपुर के वेदीपुर में प्यार को पाने के लिए नई नवेली पत्नी ने प्रेमी के हाथों पति का कत्ल करवा डाला। तो रुधौली में बांसी सिद्धार्थनगर के युवक ने गले की हड्डी बनी शादीशुदा प्रेमिका को ही मौत के घाट उतार दिया। हालात ऐसे हैं कि किसी की मंजिल मौत बन रही है, तो कोई प्रेम को पाने या बचाने की जिद में सलाखों के पीछे उम्र भर की कैद का इंतजाम कर बैठा है। ताजा घटनाओं की परतें उठाती हैं कि आज प्रेम का मतलब समझने से ज्यादा, उसे हर हाल में हासिल करने की सनक बढ़ रही है।
मनोविज्ञानी डॉ. एके दुबे कहते हैं, भावनाओं के तूफान में युवा फैसले तो जल्द ले लेते हैं, पर परिणाम झेलने की क्षमता नहीं बची। रिश्तों में संवाद की कमी, सोशल मीडिया का प्रभाव और अवसाद का दबाव मिलकर एक खतरनाक विस्फोट बना रहे हैं। प्रेम पहली मुलाकात में नहीं, समझ और सम्मान में पनपता है।
लेकिन आज युवक-युवतियां तुरंत सबकुछ पा लेने की चाह में गलत रास्ते चुन लेते हैं। असफलता का सामना होते ही टूट जाते हैं, और खतरनाक कदम उठा लेते हैं। भले ही बाद में उन्हें पछतावे के अलावा कुछ हासिल नहीं होता हो, लेकिन समय रहते आंख नहीं खुल रही है।
क्या कहते हैं जानकार : काउंसलर डॉ. शैलजा मिश्रा बताती हैं कि प्रेम में असफल होना जीवन की असफलता नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब युवा रिश्ते को मेरा हक समझ लेते हैं। संवाद और संयम रिश्तों की सबसे बड़ी शक्ति है। हिंसा व जिद प्यार नहीं, मानसिक अस्थिरता का रूप है। वहीं, समाजशास्त्री डाॅ. रघुवर पांडेय बताते हैं कि सोशल मीडिया और फिल्मी प्रभाव ने प्रेम को ग्लैमर, तड़क-भड़क और अधिकार का मामला बना दिया है। आज का युवा परिणाम नहीं सोचता, सिर्फ पल की भावनाओं में बह जाता है। शिक्षा संस्थानों में भावनात्मक मार्गदर्शन और काउंसलिंग व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए।