फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

1857 की क्रांति में अंग्रेजों को चटा दी थी धूल

विज्ञापन
महुआ डाबर गांव में प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जलाई गई मस्जिद का अवशेष। - फोटो : BASTI
विज्ञापन
1857 की क्रांति में अंग्रेजों को चटा दी थी धूल
विज्ञापन

महुआ डाबर गांव की खंडहर में तब्दील मस्जिद आज भी देती है क्रांतिकारियों के वीरता की गवाही
क्रांति के बाद अंग्रेजों ने नेस्तनाबूद कर दिया था गांव, कई लोगों ने कर दिया था पलायन
नगर बाजार, बस्ती। जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर मनोरमा के तट पर स्थित महुआ डाबर गांव के वीरों ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को धूल चटा दी थी। विद्रोह के स्वर को दबाने के लिए जब ब्रिटिश हुकूमत की सेना यहां पहुंची तो गांव के लोगों ने आमने-सामने मुकाबला किया और कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। इससे बौखलाए अंग्रेजों ने बाद में पूरे गांव में आग लगा दी, जिसका सबूत यहां खंडहर में तब्दील मस्जिद आज भी देती है।
देश की स्वतंत्रता के लिए अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जिले के महुआ डाबर के क्रांतिकारियों ने इतिहास में गांव की गौरव गाथा को अमर कर दिया। महुआ डाबर गांव पर शोध करने वाले शाह आलम बताते हैं कि इतिहास के पन्नों को पलटने से पता चलता है कि आजादी के लिए पहली बार मंगल पांडेय के आह्वान पर मोर्चा खोला गया तो मेरठ से 10 मई 1857 को और दिल्ली से 11 मई 1857 को इसकी आग सुलगनी शुरू हुई थी। तब महुआ डाबर के रणबांकुरों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला कर रख दिया था।
विज्ञापन
विज्ञापन

1857 की क्रांति में यहां के लोगों ने अंग्रेंजी सेना का जमकर मुकाबला किया था। तमाम यातनाओं के बाद भी यहां के क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने घुटने नहीं टेके। 10 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने लेफ्टिनेंट लिंडसे ले, थॉमस ले, इंग्लिश ले, रिची ले, कॉकल व सार्जेंट एडवर्ड को घेरकर मनोरमा नदी के किनारे मार गिराया था, लेकिन सार्जेंट बुशर किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल हो गया था। उसने इस घटना की जानकारी अपने अधिकारियों को दी। छह अंग्रेजी सैनिकों की मौत की खबर से पूरी ब्रिटिश हुकूमत बौखला गई। अंग्रेजी सेना ने 20 जून 1857 को बस्ती के तत्कालीन कलेक्टर पेपे विलियम्स के निर्देश पर महुआ डाबर गांव पर भारी फौज लेकर हमला कर दिया। उस समय हथकरघा उद्योग का केंद्र रहे लगभग पांच हजार की आबादी वाले महुआ डाबर को घुड़सवार सैनिकों से चारों तरफ से घेर लिया और गांव में आग लगा दी। मकानों, मस्जिदों और हथकरघा उद्योग को जमींदोज करवा दिया। इसके बाद गांव को गैर चिरागी घोषित कर दिया। इस घटना में तमाम ग्रामीण शहीद हो गए। कितनी महिलाओं का सुहाग उजड़ गया, बच्चे यतीम हो गए। यहां के तमाम क्रांतिकारी देश के लिए शहीद हो गए, जो लोग किसी तरह से बच गए थे, वे लोग मुंबई, गुजरात, बड़ोदरा, मालेगांव व अन्य राज्यों में जाकर बस गए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें