आईएएस सौम्या अग्रवाल और संयुक्ता समद्दार
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केंद्र की सेवा से आईं संयुक्ता समद्दार बरेली के मंडलायुक्त के पद पर पांच महीने ही रह पाईं। सोमवार को उन्हें पद से हटा दिया गया। प्रदेश सरकार ने उन्हें बाध्य प्रतीक्षारत सूची में डालकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है, लेकिन इसकी वजह क्या रही इसे लेकर अफसरों और नेताओं के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही उनका फोकस मंडल के अन्य जिलों से अधिक शहर पर फोकस रहा। इसे ही शासन की नाराजगी की वजह बताया जा रहा है। कुछ एक विवादित मामलों में उनके हस्तक्षेप ने नेताओं और संगठन से जुड़े कुछ लोगों को असहज कर दिया। जिस पर उन्हें तटस्थ रहने की हिदायत भी दी गई थी। हालांकि इसकी पुष्टि को कोई तैयार नहीं है।
2 अक्तूबर 2022 को संयुक्ता समद्दार को कमिश्नर के पद पर बरेली में तैनाती मिली। इसके बाद उन्होंने शहर के स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्टों को प्राथमिकता से देखना शुरू किया। शहर के कुतुबखाना पुल, लालफाटक ओवरब्रिज व किला पुल पर चल रहे कार्यों का उन्होंने स्थलीय निरीक्षण किए।
मंडल को दिलाया पहला स्थान
आईजीआरएस, विकास कार्यों की रैंकिंग में बरेली मंडल को प्रदेश में पहले पायदान पर पहुंचाने में भूमिका निभाई। मगर बाकी जिलों पर उनका फोकस उस तरह से नहीं रहा जैसी दिलचस्पी उन्होंने शहर के कार्यों को लेकर दिखाई। अब अचानक जब उन्हें हटाया गया तो तरह-तरह की चर्चा होने लगी।
सियासी गलियारों से कहा गया कि एक बड़े नेता ने उन्हें विवादित मामलों से दूर रहने की हिदायत जरूर दी थी, इसके अलावा जनप्रतिनिधियों के कार्यों व उनकी मांगों को वह प्राथमिकता सूची में रखती थी। ऐसे में शासन में कभी किसी जनप्रतिनिधि की ओर से उनकी शिकायत नहीं हुई। मगर अफसरों में भी अंदरखाने एक खींचतान चल रही थी तो इस कार्रवाई यह भी एक वजह बनी है।
डीवीवीएनएल व केस्को की एमडी रह चुकी हैं सौम्या अग्रवाल
आईएएस सौम्या अग्रवाल कानपुर में उप जिलाधिकारी के पद पर तैनात रह चुकी हैं। महाराजगंज में मुख्य विकास अधिकारी और जिलाधिकारी रहीं। फिर उन्नाव में डीएम रहीं। इसके बाद वह कानपुर में केस्कों में बतौर एमडी भेजी गईं फिर वह डीवीवीएनएल की प्रबंध निदेशक के पद पर भी रह चुकी है। उनकी तैनाती बस्ती में भी रही।
वर्तमान में सौम्या अग्रवाल बलिया में बतौर डीएम कार्यरत हैं। सिविल सर्विस में आने से पहले वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर रही और वर्ष 2004 में पुणे की एक निजी कंपनी में नौकरी की। यहां कंपनी ने उन्हें लंदन भेज दिया। मगर करीब दो साल बाद वह भारत लौट आईं और सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू कर दी।