शिक्षकों ने पाठ्यक्रम की पुस्तकों को हिंदी में अनुवादित कराने का दिया सुझाव
बरेली। ‘दुनिया के सभी देशों की अपनी राष्ट्रभाषा है, लेकिन भारत की राष्ट्रभाषा अभी तक तय ही नहीं हो सकी है। देश के बड़े भौगोलिक परिदृश्य में हिंदी की स्वीकार्यता है। अन्य किसी भाषा से हिंदी बोलेने वाले भी ज्यादा हैं, इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। अन्य भाषाओं का ज्ञान जरूरी है पर बगैर राष्ट्रभाषा के देश का विकास संभव नहीं है। यह कहना है कि शहर के विभिन्न महाविद्यालयों और इंटर कॉलेजों के शिक्षकों का।
अमर उजाला ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के तहत शुक्रवार को महाविद्यालयों और इंटर कॉलेज के शिक्षकों से बात की गई। उनका कहना था कि चीन, रूस, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड, इटली आदि सभी देशों की अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा है। उसी भाषा में उनका साहित्य, पाठ्यक्रम की पुस्तकें आदि उपलब्ध हैं। उन देशों के विद्यार्थी अन्य किसी भी देश में किसी भी वजह से जाएं, लेकिन वे अपनी ही भाषा में बातचीत करते हैं। इससे इतर भारतवर्ष की बात करें तो यहां के लोगों को भी इसी तरह अपनी भाषा के प्रति समर्पित होना चाहिए। इससे पहले देश की राष्ट्रभाषा तय करनी होगी। जो सिर्फ हिंदी ही होनी चाहिए।
शिक्षकों का कहना था कि इंटर तक हिंदी, इंग्लिश दोनों ही भाषाओं में पढ़ाई होती है, लेकिन जब व्यावसायिक पाठ्यक्रम, साइंस या प्रबंधन आदि पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेना पड़ता है तो सभी पुस्तकें इंग्लिश में मिलती हैं। इसकी वजह से न चाहते हुए भी विद्यार्थी को इसे स्वीकार करना पड़ता है। विश्व गुरु बनने की ओर बढ़ रहे भारत के पास अगर अपनी भाषा नहीं होगी, तो यह उम्मीद अधूरी ही रहेगी।
रोजगार की भाषा इंग्लिश होने की वजह से विद्यार्थियों और उनके अभिभावक इंग्लिश सीखने, बोलने के प्रति आकर्षित होते हैं। उन्हें समझना होगा कि हिंदी भाषा को जब तक आगे नहीं बढ़ाया जाएगा तब तक यही मानसिकता हावी रहेगी। समाज के प्रबुद्ध वर्ग को भी हिंदी के विकास के लिए प्रयास करना होगा। - अर्चना राजपूत, इंग्लिश लेक्चरर जीजीआईसी
हिंदी के विकास की बात तो सब करते हैं, लेकिन अपने बच्चों को जब हिंदी में पढ़ाने की बारी आती है तो सब पीछे हट जाते हैं। इसकी वजह है कि शुुरू से लेकर आखिर तक पाठ्यक्रम की भाषा एकसमान न होना। इसलिए जरूरी है कि पाठ्यक्रम की भाषा हिंदी हो। मातृभाषा में अच्छी पढ़ाई हो सकती है। - डॉ. वीपी सिंह, विभागाध्यक्ष, भौतिकी, बरेली कॉलेज
कई देशों ने यह साबित कर दिखाया है कि वे इंग्लिश के बजाय अपनी मातृभाषा में ही तरक्की कर सकते हैं। शुरुआत यहीं से होगी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्वीकारें। अपना सारा साहित्य हिंदी में पढ़ाना शुरू करेें और लोगों को समझाएं कि वे अपनी भाषा बोलें पर हिंदी को ही राष्ट्रभाषा चुनें। - डॉ. आलोक खरे, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विभान, बरेली कॉलेज
लोगों को लगता है कि इंग्लिश बोलने से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी और सामने वाले की मनोदशा उनके प्रति बेहतर बनेगी। यह सिर्फ भ्रम है। हमें अधिकतर कार्य हिंदी में करना चाहिए। इसके लिए व्यवहार में परिवर्तन करना जरूरी हो गया है। दूसरी भाषा का ज्ञान हो पर समर्पण मातृभाषा के प्रति हो। - डॉ. राजीव यादव, शिक्षक, वनस्पति विज्ञान, बरेली कॉलेज