एक सुनहरा अतीत पीछे छोड़ने के साथ सिंडिकेट बुक हाउस का 42 साल का सफर थम गया। अपने हजारों चाहने वालों के लिए यह बुक हाउस शुक्रवार की शाम ताले लगने के साथ इतिहास बन गया। हालांकि इससे पहले दिन भर पुस्तक प्रेमियों का तांता लगा रहा। आखिरी विदाई देने आए कई लोग अपनी भावनाओं पर भी काबू नहीं रख सके और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
सिंडिकेट बुक हाउस से भावनात्मक लगाव रखने वाले लोगों में चार दिन पहले उसकी बंदी की घोषणा करने के बाद किस कदर बेचैनी का माहौल था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके बाद से ही उनकी लगातार इस बुक हाउस पर आवाजाही बनी हुई थी। इन चंद दिनों में ही बुक हाउस पर मौजूद ज्यादातर स्टॉक बिक गया। तमाम लोग आखिरी यादगार के तौर पर यहां से किताबें ले गए।
शुक्रवार को लोगों की और भी ज्यादा आवाजाही रही। बरसों पुराने रिश्ते को आखिरी बार निभाने आए लोगों ने अपने-अपने ढंग से बुक हाउस को अलविदा कहा। कोई बुक हाउस की मालकिन संतोष वर्मा के लिए बुके लेकर पहुंचा तो किसी ने यहां केक काटकर आखिरी विदाई को यादगार बनाया। कुछ लोगों की भावनाएं आंसुओं की शक्ल में भी छलक पड़ीं।
फिर बता दें कि सिंडिकेट बुक हाउस की स्थापना संतोष वर्मा और उनके पति आरजी वर्मा ने 1979 में की थी। समय के साथ इस बुक हाउस ने सिर्फ बरेली नहीं बल्कि आसपास के तमाम शहरों में हजारों लोगों के दिलों में जगह बनाई। सिंडिकेट पर साहित्य के बड़े नामों के साथ हर बड़े लेखक की किताबें उपलब्ध रहती थीं।
इस कारण यहां हर वर्ग का पुस्तकप्रेमी पहुंचता था। सेना के अफसरों की भी यह पसंदीदा जगह थी। उनके लिए बुक हाउस में अलग सेक्शन था। एक सेक्शन बच्चों के लिए भी था जहां उन्हें पढ़ने के लिए मुफ्त कॉमिक्स भी उपलब्ध रहती थीं। हाल के कुछ सालों में ऑनलाइन माध्यमों का चलन शुरू होने के बाद किताबों की लोकप्रियता कम हुई तो सिंडिकेट के सामने भी मुश्किलें खड़ी होने लगी थीं।
भावुक करने वाला पल
सिंडिकेट बुक हाउस की संचालक संतोष वर्मा से बरेली कॉलेज में पढ़ाई के दौरान से मित्रता रही। 42 सालों में शायद कोई ऐसा महीना रहा हो जब सिंडिकेट से किताबें न खरीदी हों। सिंडिकेट बुक हाउस का हमेशा के लिए बंद होना भावुक कर देने वाला पल है।
- डॉ. पूर्णिमा अनिल, बरेली कॉलेज में अंग्रेजी की पूर्व विभागाध्यक्ष
सिंडिकेट बुक हाउस पर जितनी बेहतरीन किताबें मिलती थीं, उससे कहीं ज्यादा सौम्य संतोष वर्मा का व्यवहार है। पहली बार जब किताब खरीदने के लिए इस बुक हाउस आया था तब ज्यादा जानकारी नहीं थी। संतोष वर्मा के सुझाव पर ही यहां से ज्यादातर किताबें खरीदी हैं।
-
पुरुषोत्तम गंगवार
कई सालों से बुक हाउस से जुड़ी हूं। यहां जो किताबें उपलब्ध होती थीं वह शहर में और कहीं नहीं मिलती थीं। सिंडिकेट का हमेशा के लिए बंद होना शहर के लिए बड़ा नुकसान है। यह बुक हाउस हमेशा मेरी यादों में ताजा रहेगा।
- गीता अरोरा