आंवला लोकसभा सीट पर लगातार दो बार जीत का परचम लहराने वाले धर्मेंद्र कश्यप इस बार चुनाव हार गए। सपा के नीरज मौर्य ने उन्हें 15 हजार से अधिक मतों से हराया।
आंवला लोकसभा सीट से भाजपा के धर्मेंद्र कश्यप जीत की हैट्रिक लगाने में नाकाम रहे। मोदी लहर पर सवार होकर वर्ष 2014 में 1.38 लाख और 2019 में 1.13 लाख वोटों से जीत दर्ज करने वाले धर्मेंद्र कश्यप को इस बार मतदाताओं की नाराजगी झेलनी पड़ी। इस बार सपा के नीरज मौर्य ने उनको 15,969 मतों से शिकस्त दी। आंवला लोकसभा क्षेत्र की बिथरी चैनपुर, फरीदपुर विधानसभा क्षेत्रों से नीरज को भाजपा प्रत्याशी के मुकाबले ज्यादा वोट मिले।
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आंवला लोकसभा क्षेत्र में फरीदपुर, बिथरी चैनपुर, आंवला, शेखूपुर और दातागंज विधानसभा क्षेत्र आते हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में आंवला, बिथरी चैनपुर, फरीदपुर और दातागंज सीटों पर भाजपा ने जबकि शेखूपुर से सपा ने जीत दर्ज की थी।
इस चुनाव में सपा के नीरज को सबसे बड़ी 40 हजार से ज्यादा वोटों की लीड शेखूपुर विधानसभा क्षेत्र से मिली है। भाजपा के धर्मेंद्र कश्यप के मुकाबले सपा के नीरज मौर्य को बिथरी चैनपुर से 3,012 और फरीदपुर से 10,501 वोट ज्यादा मिले हैं।
सपा के मुकाबले भाजपा को आंवला विधानसभा क्षेत्र में 8,012 और दातागंज में 18,125 वोट ज्यादा मिले हैं। मतगणना शुरू होने बाद आखिरी राउंड तक भाजपा और सपा के बीच कांटे की टक्कर रही। बसपा के आबिद अली पहले राउंड से ही पिछड़ते गए। उनको मजह 95,630 वोट मिले हैं।
वर्ष 2019 के आंकड़े
जीते : धर्मेंद्र कश्यप (भाजपा) 5,37,675 मत
हारीं : रुचिवीरा (सपा बसपा गठबंधन) 4,23,932 मत
जीत का अंतर : 1,13,743 मत
वर्ष 2014 के आंकड़े
जीते : धर्मेंद्र कश्यप (भाजपा) 4,09,907 मत
हारे : कुंवर सर्वराज सिंह (सपा) 2,71,478 मत
जीत का अंतर : 1,38,429 मत
वर्ष 2009 के आंकड़े
जीतीं : मेनका गांधी (भाजपा) 2,16,503 मत
हारे : धर्मेंद्र कश्यप (सपा) 2,08,822 मत
जीत का अंतर : 7,681 मत
काम न आईं मोदी और योगी की सभाएं
धर्मेंद्र कश्यप को लेकर मतदाताओं में नाराजगी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2019 में भमोरा के पास आलमपुर जाफराबाद में चुनावी सभा की थी। उस समय भी धर्मेंद्र कश्यप को लेकर नाराजगी थी। इस चुनाव में भी मोदी ने इसी मैदान में चुनावी सभा कर वोट मांगे।
मुख्यमंत्री योगी ने भी आंवला लोकसभा क्षेत्र में अलग-अलग जनसभाएं कीं। दातागंज विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने दो जनसभाएं कीं। यह जनसभाएं भी मतदाताओं के रुख को नहीं बदल सकीं और लगातार तीन बार से काबिज भाजपा को यह सीट गंवानी पड़ी।