‘दिल से साबित करो कि जिंदा हो, सांस लेना कोई सबूत नहीं है’
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बरेली। श्री रामकथा प्रेमयज्ञ समिति की ओर से आयोजित संत मोरारी बापू की श्री राम कथा के पंडाल में बुधवार की शाम ‘मुशायरा’ का आयोजन हुआ। जिसमें गंगा-जमुनी तहजीब, मोहब्बत और जिंदगी के तमाम अनछुए पहलुओं से श्रोता रूबरू हुए। संत मोरारी बापू ने भी शायरों और कवियों की प्रतिभा को सराहा। उन्होंने तमाम भावनाएं को चंद शब्दों में पिरोने की कला का तहे दिल से खैरमकदम किया।
संचालन कर रहे डॉ. कलीम केसर ने ‘उन आंखों में डूब मरो, अपनी चाहत में हल हो जाओ, इश्क करो तो पागल कर दो, या खुद पागल हो जाओ’ सुनाकर महफिल में रंग ला दिया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय शायर प्रो. वसीम बरेलवी ने मंच संभाला और पढ़ा- ‘इतना बिखराव संभाला नहीं जाता मुझसे, खुद को यूट्यूटब पर डाला नहीं जाता मुझसे, पांव जख्मों के हुए जाते हैं, अब तो कांटे भी निकाले नहीं जाते मुझसे’, ‘आते हैं आने दो, ये तूफां क्या ले जाएंगे, मैं तो तब डरता जब मेरा हौसला ले जाएंगे’, नूर ककरावली ने पढ़ा- ‘वो खुशनसीब है जो बेकरार रहता है, दुखी दिलों में ही परवरदिगार रहता है, सब्र के घूंट यही सोचकर पी लेता हूं, सुनते हैं जहर से जहर भी उतर जाता है’, फहीम बदायूंनी ने ‘दिल से साबित करो कि जिंदा हो, सांस लेना कोई सबूत नहीं है, तुमने नाराज होना भी छोड़ दिया, इतनी नाराजगी भी ठीक नहीं है’, नुसरत जहीर ने पढ़ा- ‘कुछ अपने दिल की कहूं, जिक्र-ए-कायनात करूं, तेरे ख्याल से छूटूं तो तुझसे बात करूं’ सुनाकर सभी को लाजवाब कर दिया। शायर मनोज ने ‘मुझे फक्र है कि मैं जर्रा इस जमीं का हूं, कि जर्रों तक पहुंचने में सितारे टूट जाते है’, मीरगंज के शायर अकील नुमानी ने ‘इंसान बनाकर भेजे गए हो जमीन पर, इंसानियत को आम करो और खुश रहो’ सुनाकर सभी को इंसानियत का पाठ पढ़ाया।