‘सुमिरि महेसहि कहई निहोरी, बिनती सुनहु सदाशिव मोरी’। ‘आशुतोष तुम औघड़ दानी, आरति हरहु दीन जनु जानी।।’ रामचरित मानस के अयोध्याकांड में तुलसीदास ने ये चौपाइयां उस प्रसंग में लिखी हैं जिसमें राम के राज्याभिषेक के बजाय वन जाने की बात से दुखी राजा दशरथ पुत्र राम को देखकर भगवान शिव की स्तुति करते हैं। सावन में शिव पूजा का विशेष महत्व है। खासतौर से सोमवार के दिन। कांवड़िए दूर दराज से गंगाजल लाकर भगवान भोले का अभिषेक करते हैं। बेलपत्र, धतूरा, प्रसाद, दूध, दही शहद से पूजा अर्चना के लिए भक्तों का पूरे सावन भर तांता लगा रहता है। नाथ नगरी के शिवालयों के महत्व और इतिहास का संक्षिप्त परिचय-
धोपेश्वरनाथ : कैंट के धोपेश्वनाथ मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। कहते हैं कि धूम ऋषि ने यहां तपस्या की थी, तभी धोपेश्वरनाथ नाम पड़ा। मंदिर के बगल में ही बड़ा सा तालाब है। सावन और भादों में यहां मेला लगता है। शिवालय के अलावा अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर हैं। कांवड़िए गंगाजल लाकर भगवान शिव को अर्पित करते हैं।
अलखनाथ : मंदिर प्रमुख संत कालूगिरि महाराज के अनुसार पहले यहां जंगल था। आनंद अखाड़े के संत अलखिया बाबा बरगद के पेड़ के नीचे तपस्या करते थे। नवाब ने बाबा को जमीन दान में दी थी। तबसे ये मंदिर अलखनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। बाबा लक्ष्मणदास कहते हैं कि बरगद के निकट बाबा भोलेनाथ स्वयं प्रकट हुए थे। सावन में कांवड़ और गंगाजल, बेलपत्र अर्पित करने से भोले बाबा प्रसन्न होते हैं।
तपेश्वरनाथ : कहते हैं कि कभी रामगंगा के किनारे भालू और नागा बाबा तपस्या करते थे। पीपल का पेड़ था। भोलेनाथ ने बाबा को दर्शन देकर कहा, यहां मेरी स्थापना करो। महंत लखनदास बताते हैं कि संत कंडे के आग के बीच में रहकर तपस्या करते थे। तभी मंदिर का नाम तपेश्वरनाथ रखा गया। अब यहां छोटे बड़े 14 मंदिर हैं। कांवड़ चढ़ाने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं। सावन के सोमवार की पूजा का विशेष महत्व है।
वनखंडीनाथ: जोगीनवादा का ये मंदिर महाभारत कालीन माना जाता है। मान्यता है कि द्वापर में पत्नी द्रोपदी ने शिव की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। कभी गंगा की धारा बहती थी। बताते हैं कि शिवप्रतिमा को खंडित करने का भी प्रयास किया गया लेकिन वह असफल रहे। यहां काल भैरव का मंदिर और गौशाला भी हैं। महंत कुबेरानंद ने बताया सोमवार को सुबह पांच और शाम 7 बजे महाआरती होगी।
मढ़ीनाथ : महंत धर्मेंद्र गिरी प्राचीन शिव मंदिर में 10वीं पीढ़ी के हैं। बताते हैं कि प्राचीन शिवमंदिर में भोले बाबा स्वयं भू विराजमान हुए थे। तभी से मंदिर की मान्यता है। पांच अन्य मंदिर भी हैं। मंदिर की स्थापना कब हुई। इसकी निश्चित तारीख कोई नहीं बता सकता।
त्रिवटीनाथ: मंदिर की स्थापना 1474 विक्रम संवत में हुई। मंदिर के महंत ईश्वरी के अनुसार पहले यहां घना जंगल था। तीन वट के नीचे सोए चरवाहे को कुछ अहसास हुआ। जागने पर उसने वृक्ष के नीचे अद्भुत शिवलिंग देखा। दर्शन के लिए यहां भीड़ उमड़ पड़ी। तबसे इस शिवालय को टीबरीनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। ट्रस्टी संजीव औतार बताते हैं कि सावन में मंदिर रात में ढाई बजे खुलता है। श्रंगार रात में 12 बजे के बाद होता है।
पशुपतिनाथ: नेपाल (काठमांडू) के पशुपतिनाथ की तर्ज पर पीलीभीत रोड पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। 108 शिवलिंग एक ही साइज के चारों ओर स्थापित हैं। शिवलिंग पर चढ़ाया जल सरोवर में पहुंचता है। फिर ये जमीन के अंदर पहुंचता है। सेवादार संतोष शर्मा का कहना है कि 16 साल पहले हरिद्वार से नर्मदेश्वर लिंग लाकर स्थापित किया गया।