बाराबंकी।। छुट्टा मवेशियों से भरी पड़ी गोशालाओं के गोबर का उपयोग अब बायोगैस बनाने में किया जाएगा। इससे गांवों का पर्यावरण स्वच्छ रहेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा उत्पादन भी बढ़ाया जाएगा। इसे लेकर जिला प्रशासन तैयारियों में लग गया है। जिले के सभी गोशालाओं में करीब चार लाख रुपये की लागत से यह प्लांट लगाने की तैयारी है।
जिले में 33 गोशालाओं में 10 हजार से अधिक मवेशियों को संरक्षित किया जा रहा है। इन मवेशियों से होने वाले गोबर से अब बायोगैस बनाने की तैयारी चल रही है। इसे लेकर सभी गोशालाओं में बायोगैस प्लांट स्थापित करने की योजना जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई है। प्रति गोशाला पर करीब चार लाख रुपये की लागत से इस प्लांट को लगाने का स्टीमेट तैयार किया जा रहा है।
यह प्रयोग सफल रहा तो सभी गोशालाओं में इसे लगाया जाएगा। इसके साथ ही जिस गोशाला में केयरटेकर नहीं हैं या आवश्यकता से कम हैं तो वहां इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी की जाएगी। इस बाबत सीडीओ एकता सिंह का कहना है कि गोशालाओं में बायोगैस प्लांट लगाने की योजना बनाई गई है। प्रत्येक प्लांट पर करीब चार लाख रुपये का खर्च आने की उम्मीद है। मवेशियों के गोबर से बनने वाली गैस से पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं होगा।
पर्यावरण के लिए बेहतर है बायोगैस
सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की तरह ही बायोगैस भी ऊर्जा का स्रोत है। यह गैस का वह मिश्रण है, जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैविक सामग्री के विघटन से उत्पन्न होता है। इसमें मीथेन गैस होती है, जो ज्वलनशील होती है और इसे जलाने पर ऊर्जा प्राप्त होती है। बायोगैस को पर्यावरण के लिए बेहतर माना जाता है। इसमें धुआं नहीं होता है, इससे बिजली तैयार की जा सकती है।