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घर पहुंची अलीशा, आपबीती बताने में बीता दिन

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ukraine - फोटो : BANDA
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बांदा। यूक्रेन से बचकर घर लौटी अलीशा के घर सोमवार को जश्न जैसा माहौल था। परिजनों और पड़ोसियों से लेकर अन्य खानदानियों के आने का तांता लगा हुआ था। इन सभी को माता-पिता मिठाई खिलाकर बेटी की सकुशल वापसी पर खुशी जता रहे थे। उधर, सुबह करीब 6 बजे यूपी संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से बांदा आई अलीशा को लगभग पूरा दिन सिर्फ आपबीती बताने में ही बीता। दादा-दादी ने उसे मिठाई खिलाकर खुशी जताई।
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घर आते ही अलीशा को उसके दादा नजीर बख्श, दादी शबनम, मां सलमा, पिता रफीक, ताऊ अजीज मंसूरी, ताई शेफी मंसूरी, बुआ हिना, भाई रजी व हसनैन और मौसा नूर अहमद आदि ने अलीशा को गले लगा लिया। सभी की आंखों में खुशी के आंसू थे। चाय बनकर आई तो ड्राइंग रूम में पूरे घर के लोग अलीशा को घेरकर बैठ गए। अलीशा ने वह सब बयां किया जो यूक्रेन के कीव शहर से लेकर दिल्ली एयरपोर्ट आने तक उसके साथ बीता। बताया कि ओ.ओ.बोगोमुलिट्स यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थी। लेकिन यूनिवर्सिटी डीन ने युद्ध की शुरूआत होने पर भी ऑनलाइन क्लास की अनुमति नहीं दी। इस दौरान उसने 17 फरवरी को अपनी कोरोना जांच करा ली, ताकि वापसी में दिक्कत न हो। 24 को रूस का हमला हो गया। पहला धमाका सुबह 5:20 बजे सुनाई पड़ा। 27 फरवरी तक कीव में कर्फ्यू लगा रहा।
अलीशा ने बताया कि 28 फरवरी को तीन प्राइवेट कारों से 12 छात्र-छात्राओं को वोक्सालना रेलवे स्टेशन के लिए रवाना किया गया, लेकिन रास्ते में बमबारी ज्यादा होने से वोक्सालना न जाकर हंगरी बार्डर की तरफ निकल गए। अलीशा ने बताया कि रास्ते में रूस का क्षतिग्रस्त टैंक भी देखा। यूक्रेन की फौज ने हमें जाने का रास्ता बताया। 800 मीटर का सफर तय करके हंगरी बार्डर के पास चोप रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां हमारे पासपोर्ट में हंगरी में इंट्री के लिए मुहर लगाई गई। वहां से ट्रेन में वह हंगरी के पहले रेलवे स्टेशन जुहानी पहुंची। वहां भारतीय दूतावास द्वारा उपलब्ध कराई गई बसों से साढ़े 3 घंटे का सफर तय कर हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट पहुंचे। वहां से भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई फ्लाइट से इंडिया लाए गए। हालांकि उसे बुडापेस्ट में अपनी बारी का इंतजार चार दिन रुककर करना पड़ा।
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