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बुंदेलखंड की देसी गायों की बदलेगी नस्ल

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The breed of indigenous cows of Bundelkhand will change - फोटो : BANDA
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बांदा। बुंदेलखंड में कम दूध देने वाली देसी गायों की नस्ल बदलकर उन्हें दुधारू बनाया जा रहा है। इसी वित्तीय वर्ष में शुरू हुई केन कथा योजना से चित्रकूटधाम मंडल में अब तक तकरीबन एक लाख गायों का कृत्रिम गर्भाधान किया गया है। इन गायों में साहीवाल और थार्परकर नस्लों के सीमेन डाले गए हैं। पशुपालन विभाग का दावा है कि नस्ल बदलने के बाद इन गायों से 10 से 15 लीटर तक दूध लिया जा सकेगा। इससे अन्ना प्रथा पर रोक लगने की उम्मीद है।
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देसी गायों द्वारा कम दूध देने से बुंदेलखंड के अधिकांश पशुपालकों ने घाटे का सौदा मानकर इनको अन्ना छोड़ दिया है। कुछ ही वर्षों में तेजी से पनपी यह प्रथा किसानों के लिए मुसीबत बन गई है। शासन और प्रशासन पर भी इसे लेकर दबाव है। पशुपालन विभाग की ताजी गणना के मुताबिक चित्रकूटधाम मंडल में करीब 13 लाख गोवंश हैं। इनमें करीब साढ़े चार लाख देसी गोवंश हैं। इन्हें केन कथा प्रजाति के रूप में जाना जाता है।
इस नस्ल में बछड़े और सांड़ भी हैं। ये गायें अधिकतम दो से तीन लीटर और अधिकतम छह माह तक दूध देती हैं। दूध बंद होते ही पशुपालक गायों को अन्ना छोड़ देते हैं। कृषि विभाग के अनुसार प्रति वर्ष मंडल में एक लाख हेक्टेअर फसल अन्ना पशु चट कर जाते हैं।
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प्रदेश सरकार ने चित्रकूटधाम मंडल में अन्ना पशुओं से किसानों को राहत देने के लिए देसी (केन कथा) प्रजाति की गायों को चिह्नित करके इन्हें कृत्रिम गर्भाधान के लिए वृहद अभियान चलाया है। विभाग का दावा है कि मंडल के चारों जिलों में अब तक एक लाख से अधिक देसी गायों का कृत्रिम गर्भाधान किया गया है। इनसे होने वाले बच्चे साहीवाल व थार्परकर नस्ल के होंगे। इस नस्ल की गायें साल में 11 माह दूध देंगी।
पुरानी योजना को मिलते हैं नए नाम
राज्य किसान समृद्धि आयोग सदस्य और प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह का कहना है कि पशुपालन विभाग की नस्ल सुधार योजना बहुत पुरानी है। इसे नए-नए तरीके और नामों से लागू किया जाता है, लेकिन किसानों को कोई लाभ नहीं हो रहा है। अन्ना प्रथा को रोकने के लिए सरकार को किसानों के साथ बैठक कर निर्णय लेते हुए ठोस कदम उठाने चाहिए।
काफी हद तक अन्ना प्रथा पर लगेगी लगाम
जिला कृषि अधिकारी डॉ. प्रमोद कुमार का कहना है कि नस्ल सुधार योजना से अन्ना प्रथा में काफी सुधार होगा। बेहतर नस्ल की गायें 10 से 15 लीटर तक दूध देती हैं। दूध देने की समय सीमा भी अधिक होती है। यह साल में 11 माह दूध देती है। दूध क्षमता बढ़ने से पशुपालक गायों को अन्ना नहीं छोड़ेंगे। इससे काफी हद तक अन्ना प्रथा पर रोक लगेगी।
देसी गायों के नस्ल सुधार से आने वाले सालों में दूध का उत्पादन काफी बढ़ेगा। रोजगार के साधन और गायों की उपयोगिता बढ़ेगी। देसी गाय अधिकतम तीन लीटर और साल में छह माह ही दूध देती हैं। नस्ल सुधार के बाद गायों का कई गुना दूध उत्पादन बढ़ेगा। मनोज कुमार, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग, चित्रकूटधाम मंडल।
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