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तुलसीदास की दुर्लभ कृति खोजने का दावा

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बांदा। चैत चिर जीवै न कोई जीव जम को ग्रास है, मूढ़ अंधे चेत निसचै सपन सो जगवास है।
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ये पंक्तियां गोस्वामी तुलसीदास की दुर्लभ कृति वारामासा की हैं। हिंदी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार व अनुसंधानकर्ता प्रो. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने गोस्वामी तुलसीदास कृत वारामासा की खोज का दावा किया है।
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कृति के प्रथम और अंतिम पृष्ठ का जिक्र करते हुए बताया कि सूफी महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत महाकाव्य में वारामासा (वर्ष के 12 महीने) पर विरह व्यथा को ऋतुओं के माध्यम से व्यक्त किया है, जबकि गोस्वामी ने वारामासा में विरहणी नायिका के स्थान पर भक्ति भावना को आधार बनाया है।
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