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मजदूर है इसलिए मजबूर है..

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बैरिया। हाथों में सामान, सिर पर गठरी लिए पैदल घर जा रहे मजदूर बेहाल हैं। एनएच 31 पर आए दिन मजदूर पैदल जाते नजर आ रहे हैं। कई मजदूरों के पैर न तो चप्पल है और न ही वदन ढंकने के लिए पूरे कपड़े हैं। पैदल चलते-चलते पैरों में फफोले पड़ गए हैं । ये मजदूर द्वाबा क्षेत्र के अलावा बिहार, झाड़खंड के हैं, जो लॉकडाउन में मुंबई, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में फंसे हुए थे। जब इनके पास खाने पीने को कुछ नहीं बचा, रोजगार भी छिन गया। तब ये लोग गैर प्रांतों से बिना किसी की परवाह किए पैदलही चल पड़े।
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दिल्ली में पानीपूरी बेचने वाले बिहार के हाजीपुर निवासी अरविंद बिंद की साथ पैदल चल रही उसकी पत्नी आशा बिंद गर्भवती है। पैदल चलते-चलते दोनों पांडेयपुर पहुंचे थे। तब तक इनके पैरों में छाले और सूजन ने इनका रास्ता रोकने की भरसक कोशिश की। गर्भवती महिला का चलना मुश्किल हो गया था। सड़क के किनारे आराम करने के लिए दोनों बैठ गए और कुछ खाने-पीने के लिए दुकान की तलाश करने लगे। इसी बीच अमर उजाला की नजर इस परिवार पर पड़ी, जब इन्हें बिस्किट खरीदवाया गया। अरविंद ने बताया कि घर में छोटा सा खाट, बर्तन जो भी था महज 4500 रुपये में बेचकर किसी तरह पैदल निकला है। रास्ते मे कोई ट्रक वाले से सहारा मिलता गया। लेकिन इसके बदले ट्रक वाले मनमाने किराए वसूले। गर्भवती महिला की स्थिति देख एक निजी चिकित्सक से सलाह लेने के बाद कुछ दवा खरीद कर गर्भवती महिला को खिलाने के बाद एक ई रिक्शा से मांझी बार्डर तक भेजवाया गया। दिल्ली के नजबगढ़, द्वारिका, पालम इलाके में हाजीपुर के दर्जनभर लोग रहकर पानीपूरी का काम करते थे। लॉक डाउन के बाद यह लोग उसके खत्म होने का इंतजार करते रहे। जब इनके पास खाने पीने के भी पैसे खत्म हो गए तो यह कुछ व्यवस्था न होता देख अपने घर बिहार के हाजीपुर की ओर पैदल ही चल दिये।
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