माध्यमिक स्कूलों के खेल मैदान उबड़-खाबड़ जमीन में तब्दील हो गए हैं। हालात यह हैं कि इन मैदानों पर छात्रों को खेलना तो दूर की बात, वे पैदल भी नहीं चल सकते हैं। प्रश्न यह है कि ऐसे में खेल प्रतिभाएं कैसे निखरेंगी, संसाधन होने का दावा स्कूलों के जिम्मेदार तो करते हैं, लेकिन धरातल पर ऐसा नहीं दिखता है।
हाल ही में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया गया। खेल संगठनों एवं इससे जुड़े लोगों ने बड़ी-बड़ी बातें की गईं। लेकिन स्कूलों के माध्यम से खेलों के विकास की पहल की आस आज भी आधी अधूरी है। गौर करें तो हाईस्कूल व इंटर स्तर पर प्रति वर्ष हर छात्र से 60-60 रुपये क्रीड़ा शुल्क के नाम पर लिया जाता है।
इसमें से तीन माह का क्रीड़ा शुल्क डीआईओएस कार्यालय में खेल के विकास के नाम पर जमा करा लिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि माध्यमिक स्तर पर खेलों की दशा और दिशा बेहद खराब हैं।