कोविड-19 हो या अन्य बीमारियां सही समय पर उचित इलाज नहीं मिलने से अपनों को खोने का दर्द परिजन ही बता सकते हैं। कोविड-19 के कारण तो इस बार बलिया जिले में हाहाकार की स्थिति रही। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छुपी नहीं है। जिले में पिछले कई वर्षों से मेडिकल कॉलेज की मांग चल रही है। कुछ कवायद भी हुई, लेकिन सरकार के साढ़े चार साल बीतने के बावजूद इसको पंख नहीं लग सका।
विभिन्न संगठनों की ओर से भी आवाज उठाई जा चुकी है। जून 2018 में जिला प्रशासन ने इस दिशा में प्रयास शुरू किया था। कुछ जमीनों की पैमाइश भी कराइ गई, लेकिन समय के साथ ये ठंडे बस्ते में चला गया। दो मार्च 2020 को आजमगढ़ में मंडलायुक्त की बैठक में अपर निदेशक, स्वास्थ्य डा. एनएल यादव ने बताया था कि मऊ व बलिया जनपदों में मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के लिए चयनित 15-15 एकड़ के उपयुक्त स्थलों का पूरा विवरण शासन को भेज दिया है, लेकिन यह भी फाइलों में ही रह गया।
बलिया जिले की उद्योगहीनता से श्रमिक पलायन को विवश हैं। 16 जनवरी 1974 में स्थापित हुई रसड़ा चीनी मिल करीब डेढ़ दशक से बंद है। उस समय मिल में लगभग 2500 श्रमिक कार्यरत थे। अपना तथा परिवार की जीविका चलाने वाले श्रमिक रोजगार के अभाव में बेकार हो गए। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बलिया आगमन पर मिल को आधुनिक तकनीकी से पीपीपी माडल के जरिए चलाने की घोषणा की थी।
मिल को चलाने के लिए टेंडर की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद सारी प्रक्रियाएं रोक दी गई। भाजपा फिर से शुरू हुई आजमगढ़ की चीनी मिल सठियांव का क्रेडिट लेने से तनिक भी नहीं चूकती है, लेकिन जिस जिले ने उन्हें दो सांसद और पांच विधायक दिए, जहां से दो मंत्री भी हैं, यहां के मिल के बारे में कोई सुधि नहीं ली जाती है। इससे स्थानीय लोगों में शासन के प्रति नाराजगी भी है। जबकि विधानसभा चुनाव में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार बनने पर चीनी मिल एवं कताई मिल को चालू करने का वादा भी किया था।
40 करोड़ रुपये खर्च कर दुबे छपरा रिंग बंधे का निर्माण किया गया, जो गत साल पहले आई बाढ़ में बह गया। उसके बाद बाढ़ विभाग और जिला प्रशासन ने ग्राम सभा गोपालपुर की 25000 आबादी को अपने ही हाल पर जीने के लिए छोड़ दिया। इस साल न तो ग्राम सभा गोपालपुर, उदई छपरा, दुबे छपरा को बचाने के लिए न कोई परियोजना बनाई गई न कोई कटान रोधी कार्य हुआ। इसके कारण ग्राम सभा गोपालपुर के लोगों में भय है और उनकी निगाहें जनपद में आ रहे सीएम पर लगी हैं।
उत्तर प्रदेश व बिहार दोनों राज्यों के चार पंचायतों के बाशिंदे गंगा व घाघरा नदी के कटान व बाढ़ का दंश करीब एक दशक पूर्व से झेलते चले आ रहे हैं। इसके के लिए दोनों राज्यों के सरकारों ने वर्ष 16-17 में बाढ़ खंड द्वारा सुरक्षा रिंग बांध निर्माण कराने का निर्णय लिया गया। इसमें बिहार राज्य की सरकार ने अपनी सीमा के लिए 2018 में ही 8599.30 करोड़ रुपये की स्वीकृति दे दी और सरकार द्वारा अपनी सीमा में वर्ष 18-19 में ही सुरक्षा बांध निर्माण पूरा कर लिया गया।
यूपी की सीमा में इस बांध की कुल लागत करीब 130 करोड़ रुपये की स्वीकृति बनी। इसमें चारों पंचायतों के तीन तरफ से कुल चार किमी की दूरी में रिंग बांध का निर्माण होना था। निर्माण होने वाला सुरक्षा बांध जो गंगा किनारे 2300 मीटर व घाघरा किनारे 1175 मीटर में होना था जो आज भी अधूरा है।
यूपी-बिहार के मध्य गंगा पर बन रहा पुल निर्माण में नहीं आई तेजी
उत्तर प्रदेश व बिहार को जोड़ने के लिए गंगा के शिवपुर घाट पर 234 करोड़ की लागत बनने वाला पक्का पुल निर्माणाधीन है। इसके सात पिलरों पर काम चल रहा था जो फिलहाल बंद है। कुल 19 पाए वाले सेतु निर्माण की गति धीमी है। लोगों को उम्मीद है जिलेे में आ रहे सीएम की निगाह इस परियोजना पर भी पड़ेगी।