बड़ौत। जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने आत्मानुभवन, आत्मानंद, आत्मशांति, आत्माल्हाद का मार्ग है, वैराग्य पूर्ण धर्माचरण। सुखार्थी सुख चाहता है, वह बाह्य जगत प्रपंचों से अपनी आत्म रक्षा करता है। सच्चा साधक पल भर भी व्यर्थ में व्यय नहीं करता है।
वह शनिवार को ऋषभदेव सभागार मेें आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि क्रोध, कृपणता, क्रूरता, अहं, कलह शासक के शासन का अंत कर देती है। स्नेह, दानशीलता, क्षमा, समन्वय और एकता शासक के शासन को वर्धमान करती है। ऐसे ही कषाय की तीव्रता साधक के जीवन को नष्ट कर देती है। कषाय की एक कणिका साधक-संयमी की साधना, विशुद्ध परिणामों का घात कर देती है। कषाय कष्टकारी ही होती है। धनी होना है तो रात्रि भोजन छोड़ो, गुरुओं का दान दो, प्रभु भक्ति करो। सभा में प्रवीण जैन, दिनेश जैन, पुनीत जैन, मनोज जैन, सुनील जैन, विनोद जैन शामिल रहे।