सरायमीर के सिरादी का पूरा स्थित अजाखाना जहरा में मजलिस को संबोधित करते सैय्यद जीशान अली निजामबा?
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सरायमीर। कस्बा के सिरादी का पूरा मुहल्ला स्थित अजाखाना जहरा में आयोजित मजलिस को संबोधित करते हुए सैय्यद जीशान अली निजामबादी ने कहा कि अगर इंसान मकसद-ए-कर्बला को समझ जाए तो अपनी जिंदगी को कामयाब बना सकता है। क्योंकि जिसने मकसद-ए- कर्बला समझ लिया उसने इस्लाम, कुरआन, नमाज, रोजा सब समझ लिया। मकसद-ए-कर्बला वही है, जिसने पूरी इंसानियत को अमन का पैगाम देने पर मजबूर कर दिया।
आगे मजलिस में उन्होंने कहा कि हम सभी को मकसद-ए- हुसैन समझने और उस पर अमल करने की जरूरत है। तभी जिंदगी कामयाब बन सकेगी। हमे ऐसा किरदार बनाना चाहिए कि हर देखने वाला कह सके कि ये हुसैन के मानने वाले हैं। जो भी हुसैनी होगा व जालिम के आगे कभी सर नही झुकाएगा। उन्होंने कहा कि जितने भी रसूल पैगंबर व इमाम आए सभी ने अपनी जिंदगी अल्लाह की मर्जी पर गुजारी इन रसूल व इमाम की जिंदगी से सबक लेकर हमें ऐसा अमल करना चाहिए कि जिसे अल्लाह क़बूल करे। हम सभी को खुद की पहचान बनाने के बजाए दीन की पहचान पर काम करना होगा। इंसान को हर हाल में इंसाफ़ पसंद होना चाहिए। कितनी भी मुश्किल की घड़ी आए, हक पर खड़े रहना चाहिए। आखिर में मौलाना ने कर्बला के शहीदों पर होने वाले जुल्म को बयान किया, तो अजादारों की आंखें नम हो गई। मजलिस के दौरान सैफ़ भादवी व मोहम्मद हुसैन सरायमीरी ने पेशख्वानी व राशिद भादवी तौहीद हुसैन ने नौहाख्वानी करके बारगाहे शहीदाने करबला में खेराजे अकीदत पेश किया। वहीं, मेजवां में चांद दिखते ही शिया समुदाय के लोग गम में डूब गए। लोग काले लिबास में दिखाई पड़ रहे हैं। बुधवार को पहली मोहर्रम के मद्देनजर इमाम बारगाहों में मजलिसे आयोजित की गई। घरों में अजाखाने सज गए। मौलाना फ़रहत हुसैन ने बताया कि बगदाद से 80 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित इस्लाम की पवित्र भूमि कर्बला मुसलमानों के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इसी शहर में पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन इस्लाम की रक्षा के लिए शहीद हुए थे। इस पवित्र शहादत का प्रसंग इस्लामिक इतिहास से संबद्ध है। इस्लाम की मशाल रोशन करने वाले इमाम हुसैन की छोटी सी सेना को कर्बला के रेगिस्तान में विरोधी पक्ष ने घेर लिया। दोनों सेनाओं के बीच हुए युद्ध में इमाम हुसैन की छल से हत्या कर दी गई थी। कर्बला की जमीन पर हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत के बाद हुसैनी खेमे की बागडोर उनकी बहन जनाबे जैनब ने ही संभाली थी। जनाबे जैनब ने ही मातम और मजलिस की बुनियाद रखी थी। यही वजह है कि आज कर्बला के शहीदों के गम में एक चादर बिछा कर कर्बला के शहीदों के नाम आंसू बहाए जाते हैं, उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए सदियों से महिलाएं जनाबे सकीना, फातमा जहरा, जनाबे जैनब का ताबूत और अली असग़र का झूला उठाती चली आ रही है।