यमुना चंबल संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन काल से आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है। मान्यता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखा था।
आगरा जाते समय महात्मा तुलसीदास भी इस मंदिर में कुछ समय रहे। परमहंस गुंधारी लाल ने भारेश्वर महाराज की तपस्या कर अपना कर्मक्षेत्र ग्राम वड़ेरा को बनाया। परमहंस पुरुषेात्तम दास महाराज ने बिना भोजन व जल के भोलेनाथ की तपस्या की।
ग्राम गढ़ा कास्दा निवासी एवं भागवताचार्य पंडित रजनीश त्रिपाठी के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर शंकर भगवान की आराधना हेतु भीमसेन द्वार व शंकर की विशाल पिंडी की स्थापना की थी, जिसकी द्रोपदी सहित पांचों पांडवो ने पूजा अर्चना की।
मुगलकाल में जब व्यापार नदियों के माध्यम से होता था। तब भरेह कस्बा उत्तर भारत का प्रमुख व्यापार केंद्र था। उस समय गुजरात व राजस्थान के व्यापारी अपना माल चंबल नदी के माध्यम से तथा आगरा, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा के व्यापारी यमुना नदी के माध्यम से अपना माल इलाहाबाद , विहार व कलकत्ता भेजते थे, जहां से विदेश तक माल जाता था।
किदवंतियों के अनुसार यमुना चंबल के संगम पर विशाल भंवरें पड़ती थी, जिसमे नाव फंसने पर नाव नदी में ही डूब जाती थी। राजस्थान के व्यापारी मदन लाल जब अपनी नाव से माल सहित संगम पर पहुंचे तो उनकी नाव भी इस भंवर में फंस गई, जिससे व्याकुल होकर अंतिम समय समझकर उन्होंने भगवान भोले नाथ का श्रद्धा से स्मरण किया।
वैसे ही उनकी नाव भंवर से छिटककर किनारे लग गई, जहां भीम द्वारा स्थापित शिवलिंग रखा था। सेठ ने उनकी पूजा अर्चना की बाद वहां एक विशाल मंदिर की स्थापना का संकल्प लिया।
मंदिर निर्माण के उपरांत सेठ परिवार सहित भरेह आए बाद में व्यापार के लिए उन्होंने अजीतमल को अपना निवास स्थल बनाया। उन्होंने आर्यनगर में एक राम जानकी मंदिर , वर्तमान इंटर कालेज स्थल पर पंचद्वारी, शिव मंदिर, पक्का बाग व उसमे हनुमान मंदिर तथा ढाई एकड़ का पक्का तालाब बनवाया।
मान्यता के अनुसार जो भक्त भगवान भोले नाथ की पूजा करके बाहर नंदी के कान में जो भी मनोकामना मांगता है। वह शीघ्र ही पूरी हो जाती है। सावन के सोमवार तथा शिवरात्रि पर श्रद्धालुओं द्वारा भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना की जाती है।