वह स्वाभाविक रूप से हम बच्चों की दादी हो गई थीं। खाने और खिलाने की शौकीन महादेवी अचार, पापड़, पराठे भी बना लेती थीं तो जरूरत पड़ने पर सिलाई मशीन लेकर भी बैठती थीं और बड़े मनोयोग से अपने कपड़े खुद ही सिल लेती थीं। वह सांसारिक रूप से जीवन से लगाव रखने वाली महिला थीं। कुत्ते, बिल्ली से घिरी रहकर भी वह ‘तोड़ दो वह क्षितिज मैं भी देख लूं उस ओर क्या है’ जैसी कविताएं लिख लेती थीं।
चाट, चटपटे, डोसे, हलुवा, पूड़ी, नमकीन की शौकीन महादेवी जी को यह पता होता था कि सिविल लाइंस में कहां अच्छी कुल्फी मिलेगी और पैलेस के पास कौन सा ठेले वाला सबसे अच्छी चाट लगाता है। शादी के प्रसंग पर वह कहती थीं कि नीलामी पर चढ़े लड़के से शादी हरगिज मत करना। खूब पढ़ो, आत्म निर्भर बनो।
उन्होंने ही मेरे विवाह का आमंत्रण पत्र लिखा था। दो आत्मीय साहित्यिक परिवार एक हो रहे थे। स्वागतोत्सुक के नीचे अमृत राय जी ने भी हस्ताक्षर किए थे। महादेवी आवास पर साहित्यिक मेला सा लग गया था। रघुवंश, रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ. जगदीश गुप्त, अमृत राय, डॉ. रामकुमार वर्मा, नर्मदेश्वर उपाध्याय, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, कैलाश गौतम यानी कि इलाहाबाद की हर पीढ़ी के रचनाकार मौजूद थे ।
अशोक नगर आवास से विदाई के दिन वह जैसा कातर थीं, वैसा मैंने दोबारा कभी नहीं देखा। उनके धैर्य का बांध टूट गया था। वह आम महिला की तरह बिलख-बिलख कर रोये जा रहीं थीं। दादी मेरे विदा होने के बाद दुखी जरूर थीं पर आश्वस्त भी थीं कि वह अपनी बिटिया को कवि उमाकांत मालवीय के घर भेज रही हैं। आज भी उनकी यही छवियां मेरे लिए संबल बनी हुई हैं।