चुनावी फिजा में इन दिनों ‘चौकीदार’ के नाम से गढ़े नारे खूब गूंज रहे हैं। उनके नाम को लेकर मचे घमासान के बीच उन्हें कुशल श्रमिक का दर्जा देने समेत न्यूनतम वेतनमान तय करने का वायदा तक सरकार पूरा नहीं कर सकी है। बारह घंटे की हाड़तोड़ ड्यूटी करने वाले चौकीदार आज भी सरकार की ओर उम्मीद से देख रहे हैं। आश्चर्य की बात यह कि इसे वह सरकार भी पूरा नहीं कर सकी, जिसके कार्यकर्ताओं में इन दिनों खुद को चौकीदार बताने की होड़ लगी है।
महानगरों में अब चौकीदारों की नई पहचान सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर हो गई है। पिछले दस वर्षों के दौरान इनका दायरा काफी अधिक बढ़ा गया है लेकिन काम करने वाले सुरक्षा गार्डों की हालत बहुत बेहतर नहीं है। जानी-मानी सिक्योरिटी एजेंसी में काम करने वाले गार्ड ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 12 घंटे की ड्यूटी शिड्यूल में काम करना पड़ता है लेकिन ओवर टाइम में यह नहीं जुड़ता। नियमित ड्यूटी के लिए सुपरवाइजर को पैसे देने पड़ते हैं। ड्यूटी ज्वाइन कराने से पहले जमानत के नाम पर मोटी रकम देनी पड़ती है। वर्दी, सीटी, डंडा के लिए भी अलग से पैसे देने होते हैं। उसके बाद वेतन के नाम पर 8-10 हजार ही हाथ में आते हैं।
तनख्वाह मिलने का समय भी तय नहीं है। कौशांबी के चरवा से रोजना सिविल लाइंस ड्यूटी करने आने वाले अखिलेश बताते हैं पैसा कम मिलने से शहर में कमरा नहीं ले पा रहे। लिहाजा, गांव से रोजाना करीब 15 किलोमीटर साइकिल चलाकर आना पड़ता है। उसके बाद 12 घंटे की ड्यूटी करते हैं। त्यौहारों पर छुटियां भी नहीं मिलती। वहीं, प्रयागराज में सिक्योरिटी एंजेसी चलाने वाले परमानंद मिश्र का कहना है कि बड़ी संख्या में बेरोजगार युवकों के आने की वजह से कई एंजेसियां मनमाना फायदा उठाती हैं। उनका भी कहना है कि जितनी तेजी से यह काम बढ़ा है, उसको देखते हुए अलग से नियम बनाए जाने की जरूरत है।
निजी क्षेत्र में काम करने वाले यह सुरक्षा गार्ड पिछले काफी समय से खुद को कुशल श्रमिक का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने दो साल पहले सिक्योरिटी गार्डों को यह दर्जा देने के साथ ही न्यूनतम वेतनमान 15 हजार रूपये का भी वायदा किया था लेकिन अभी तक यह मांग पूरी नहीं हुई। इसी तरह सशस्त्र गार्डों एवं सुपरवाइजरों को अति कुशल श्रमिक के तौर पर न्यूनतम 25 हजार दिए जाने की मांग भी काफी समय से की जा रही है।