देखते ही देखते बढ़ता गया वर्चस्व
यह वह दौर था जब राजू का नाम अतीक से भी जुड़ा। देखते ही देखते उनका वर्चस्व बढ़ता चला गया। इसी दौरान वह पड़ोसी जनपद के बसपा के एक कद्दावर नेता के संपर्क में आ गए। 2004 में अतीक के फूलपुर से सांसद चुने जाने के बाद शहर पश्चिमी विधानसभा सीट खाली हो गई। राजू को लगा कि क्यों न अतीक की जगह वह ले लें। उनके कुछ करीबियों ने भी उन्हें चुनाव लड़ने की सलाह दी। हालांकि, यह बात अतीक को ठीक नहीं लगी।
दरअसल, अतीक इस सीट पर अपने भाई अशरफ को चुनाव लड़ाना चाहता था। उसने राजू को चुनाव में उतरने से मना किया। अपने स्वभाव के मुताबिक, राजू मैदान से हटने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने अतीक से साफ कह दिया कि वह चुनाव लड़कर ही रहेेंगे। अतीक को उनकी यह बात बेहद नागवार गुजरी। उधर, राजू पाल ने पड़ोसी जनपद के नेता के जरिये बसपा के बड़े नेताओं से मुलाकात की और चुनाव के लिए दावेदारी पेश की।
इसके बाद टिकट मिल गया और फिर वह हुआ, जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं था। उसने इस सीट पर हुए चुनाव में अशरफ को पांच हजार वोटों से हराकर शहर पश्चिमी क्षेत्र में अतीक की बादशाहत खत्म कर दी। इस तरह से राजू पाल गांव में दबंगई करने वाले एक लड़के से शहर पश्चिमी क्षेत्र का विधायक बन बैठे।