करछना पॉवर प्लांट के लिए अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा लेने वाले अब मुआवजा लौटाकर जमीन वापस पाना चाहते हैं तो प्रशासन इसके लिए तैयार नहीं हो रहा, उल्टे प्रशासन ने उन किसानों की जमीन भी छीन ली है जिन्होंने अधिग्रहण के दौरान मुआवजा लेने से इनकार कर दिया था। ऐसे किसानों की संख्या दर्जनों में है, जिन्हें अब जमीन के बदले जमीन देने की बात कही जा रही है। प्रशासन ने इसके लिए औपचारिकताएं भी पूरी कर ली हैं, लेकिन किसान अब तक यह नहीं जानते कि उन्हें जमीन कब और कहां मिलेगी। वे जमीन देने को तैयार भी नहीं हैं लेकिन सख्ती भय से खुलकर विरोध भी नहीं कर सकते। किसानों को आशंका भी सता रही है कि प्रशासन उनकी उपजाऊ जमीन के बदले कहीं बजर भूमि न आवंटित कर दे। ऐसे में किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।
वैसे भी किसान डेढ़ साल से परेशान हैं। पहले अतिवृष्टि, उसके बाद सूखे के कारण खेती चौपट हो गई और किसान बर्बाद हो गए। जिन किसानों ने करछना पावर प्लांट के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन का मुआवजा नहीं लिया था और वे जमीन देने को तैयार नहीं थे, अब उन्हें भी अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ेगा। किसान अपनी उपजाऊ जमीन पर खेती कर जैसे-तैसे गुजारा कर रहे थे। प्रशासनिक अफसरों का कहना है कि जिन किसानों ने मुआवजा नहीं लिया था, उन्हें अब जमीन के बदले जमीन दी जाएगी। हालांकि किसानों को जमीन कहां दी जा रही है, यह अभी स्पष्ट नहीं हो सका है। किसान परेशान हैं। उनका कहना है कि जमीन अगर घर से कोसों दूर दी गई तो वहां खेती करने कौन जाएगा। यह भी गारंटी नहीं की जमीन उपजाऊ होगी। जमीन बंजर भी हो सकती है।
आंदोलन के मुखिया की भी गई जमीन
करछना पावर प्लांट के निर्माण सबसे पहले इसी मुद्दे पर हुआ था कि सरकार ने भूमि अधिग्रहण के दौरान उपजाऊ और बंजर भूमि की कीमत एक समान लगाई। सबको तीन लाख रुपये प्रति बीघा की दर से मुआवजा बांटा गया। जिन्होंने विरोध में मुआवजा नहीं लिया और देने के लिए तैयार नहीं हुए, उनमें आंदोलनकारी किसानों के मुखिया राज बहादुर पटेल भी शामिल हैं। पिछले साल किसानों के आंदोलन के दौरान पुलिस ने राज बहादुर पटेल सहित दर्जनों किसानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। कई किसानों को जेल भेज दिया गया। राज बहादुर पटेल को पुलिस ने फरार घोषित कर दिया है और इनाम भी घोषित किया है।
हम जमीन देने के लिए तैयार नहीं थे और इसी वजह से मुआवजा भी नहीं लिया। इसके बावजूद सरकार ने हमारी डेढ़ बीघा जमीन ले ली है। यह किसानों का उत्पीड़न है।’ रीता देवी पत्नी राज बहादुर पटेल, कचरी गांव
मेरी एक बीघा जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया है जबकि हमने मुआवजा लेने से इनकार कर दिया था। यह जमीन का अधिग्रहण नहीं है, बल्कि किसानों से जमीन छीनी जा रही है।’ ननकऊ, कचरी गांव
अगर किसान ने मुआवजा नहीं लिया तो प्रशासन को भी उसकी जमीन लेने का कोई अधिकार नहीं। मुआवजा न लेने के बावजूद मेरी एक बीघा जमीन ली जा रही है। जमीन कहां मिलेगी, यह भी तय नहीं।’ राधे श्याम, कचरी गांव
मेरे पास सिर्फ 10 बिस्वा जमीन थी। उसी से गुजर-बसर होती थी। जमीन न जाए, सो मुआवजा नहीं लिया। इसके बावजूद जमीन हाथ से चली गई। दूसरी जगह जमीन कब और कहां मिलेगी, अब तक मालूम नहीं।’ सत्य नारायण, कचरी गांव