जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के सभी दावे निरर्थक साबित हो रहे हैं। विभाग के लाख प्रयास के बाद भी वर्ष 2011 में हुई आर्थिक जनगणना के बाद जिले की जनसंख्या 626248 बढ़ गई है। एक साल के भीतर 25 हजार से अधिक महिलाओं ने तीसरे और चौथे बच्चे को जन्म दिया है। सत्तर हजार महिलाओं ने पहले और दूसरे बच्चे को जन्म दिया है। जबकि स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि जिलेभर में जागरूकता अभियान और परिवार नियोजन की तमाम योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाया जा रहा है।
शासन की ओर से सीमित परिवार की अवधारणा के तहत हम दो हमारे दो का नारा दिया गया है। जिले में स्वास्थ्य विभाग इसे लागू कराने में फेल हो गया है। जागरूकता अभियान महज कागजों तक सिमटकर रह गया है। स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 2011 में जिले की आबादी 31,73,752 थी। मौजूदा समय में यह बढ़कर 38,00000 पहुंच गई है। अप्रैल 2020 से लेकर मार्च 2021 तक 90 हजार जनसंख्या बढ़ी है। 25 हजार महिलाएं ऐसी हैं जो पहली बार मां बनी है। 45 हजार महिलाओं ने दूसरे बच्चे को जन्म दिया है। 25 हजार महिलाओं ने तीसरे और चौथे बच्चे को जन्म दिया है।
शासन के आदेश पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से हर वर्ष 11 जुलाई को जनसंख्या नियंत्रण दिवस मनाया जाता है। जुलाई माह में लोगों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए तमाम जानकारियां दी जाती हैं, लेकिन इसका असर होता नहीं दिख रहा है। डीपीएम राजशेखर ने बताया कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए योजनाओं का लाभ लोगों को मुफ्त दिया जाता है। बाजार में बिकने वाला अंतरा इंजेक्शन हो या फिर छाया टैबलेट, आपातकालीन गर्भ निरोधक गोलियां सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दी जा रही हैं। नसबंदी कराने पर शासन की ओर से प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।
सालभर में 4708 महिलाओं ने कराई नसबंदी
जनसंख्या नियंत्रण के लिए शासन की ओर से नसबंदी पखवाड़ा भी चलाया जाता है, मगर स्वास्थ्य विभाग के अफसर इसमें रुचि नहीं लेते हैं। अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के बीच में 4708 महिलाओं ने नसबंदी कराई। पुरुष नसबंदी कराने में फिसड्डी साबित हुए। एक साल में सिर्फ 15 पुरुषों ने ही नसबंदी कराई।