सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जिस मूक गवाह की गवाही के आधार पर फांसी की सजा सुनाई गई है, उसकी गवाही न तो स्पष्ट थी और न ही इसमें विधिक प्रक्रिया का पालन किया गया था। हाइकोर्ट के आदेश पर मूक गवाह की दोबारा गवाही कराई गई, लेकिन मुल्जिमों को बयान दर्ज कराने का अवसर दिए बिना निचली अदालत ने अभिलेखों को हाईकोर्ट भेज दिया।
हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा निचली अदालत को वापस करते हुए दो माह में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत मुल्जिमों के बयान दर्ज कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन गवाह के विरुद्ध 313 की कार्यवाही मुल्जिम का महत्वपूर्ण अधिकार है, जिससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता।