तर्क दिया गया याची संस्था वर्ष 1985 में काम करने की बात कह रही है, जबकि हकीकत में ऐसा कोई काम कराया ही नहीं गया। कार्यदायी संस्था ने वर्ष 2004 में दावा किया है, जो कि आवेदन की समय सीमा से बाहर है। कोर्ट ने भी पाया कि कार्यदायी संस्था द्वारा किए जा रहे दावे का कोई ठोस आधार नहीं है।
कोर्ट ने इसे मध्यस्थता माफिया की श्रेणी में माना। कहा कि कार्यदायी संस्था पहले भी ऐसा कई मामलों में कर चुकी है। कोर्ट ने याची के दावे को डेडवुड (बेकार), प्रथमदृष्टया गुणहीन, तुच्छ और बेइमानी युक्त बताया। कहा कि याचिका मध्यस्थता अधिनियम की धारा 11 के तहत पोषणीय नहीं है। कार्यदायी संस्था इस फर्जीवाड़े के लिए प्रतिवादी इफको को 11 लाख रुपये हर्जाने का भुगतान एक महीने के भीतर करे।