पिंडदान स्थगित होने की दशा में हजारों परिवारों की रोजी रोटी पर असर पड़ने की आशंका है। उल्लेखनीय है कि दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए प्रथम श्राद्ध प्रयागराज के संगम में और आखिरी पिंडदान गया में करने की मान्यता रही है। कोरोना संक्रमण की वजह से गया में पिंडदान पर रोक के बाद शनिवार को संगमनगरी में भी पितृपक्ष के कर्मकांड स्थगित होने की बात कही जा कही है।
पितृपक्ष में संगम की रेती पर पिंडदान के लिए देश ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों से सनातन संस्कृति को मानने वाले आते रहे हैं। पड़ोसी देश नेपाल, इंडोनेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा से भी लोग अपने पूर्वजों के नाम पर पिंडदान करने के लिए पितृपक्ष में संगम की रेती पर आते रहे हैं, लेकिन इस बार परंपरा टूटने की आशंका है। छह महीने पहले हुए लॉकडाउन के बाद से ही संगम पर धार्मिक परंपराएं और अनुष्ठान प्रभावित हैं।
अब कहा जा रहा है कि दो सितंबर से आरंभ हो रहे पितृपक्ष के दौरान यज्ञभूमि संगम में लोग अपने दिवंगत परिजनों यानि पितरों की शांति व मोक्ष के लिए पिंडदान व तर्पण नहीं कर सकेंगे। तीर्थपुरोहित राजमणि तिवारी, सोहन लाल जोशी व विजय शुक्ला के पुलिस की सख्ती की वजह से तीर्थयात्री नहीं आ रहे हैं। घाटों पर पहले से ही सन्नाटा है। अब पितृपक्ष पर रोक लगाने की सुगबुगी शुरू हो गई है। तीर्थपुरोहितों का कहना है कि ऐसा उनकी जानकारी में पहले कभी नहीं हुआ था।
मान्यता के अनुसार दिवंगत पूर्वजों की आत्माओं को मोक्ष व शांति तभी मिलती है, जब उनके वंशज प्रयागराज में गंगा, यमुना, सरस्वती केसंगम पर प्रथम श्राद्ध करते हैं।