इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ही परिवार के तीन लोगों की हत्या और दुष्कर्म के मामले में आरोपी की मृत्युदंड की सजा को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही निचली अदालत को फिर से मामले की सुनवाई पर विचार करने को कहा है।
कोर्ट ने कहा कि याची को मामले मेंफैसला होने तक विचाराधीन कैदी माना जाएगा। याची अगर जमानत के लिए अर्जी देता है तो हाईकोर्ट के फैसले से उसका कोई संबंध नहीं होगा। अदालत जमानत देने के मामले में फैसला देने केलिए स्वतंत्र होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति समीर जैन की खंडपीठ ने नजीरुद्दीन की अपील पर दिया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सीआरपीसी की धारा 313 के तहत निचली अदालत में दोबारा सुनवाई केदौरान अभियोजकों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना अपराध को साबित करने केलिए प्रतिपरीक्षा केलिए गवाहों को फिर से बुलाया जा सकता है।