असली धर्म... मेरे कार्टूनों से ओशो बहुत प्रभावित थे, मैं भी उनसे। वह प्रवचनों में कार्टूनों की अपने ढंग से व्याख्या करते। मेरी राय में असली धर्म इंसानियत है। पर, आज भी बच्चों में बचपन से धर्म को ठूंस रहे हैं। गलत है यह। उन्हें अच्छी शिक्षा दो, वो जो चाहे धर्म अपनाए। मैंने तो यही किया है।
पैसे का मोल...पैसे से मन के संतोष का कुछ लेना-देना नहीं। इसके पीछे न भागें। बस, मन का काम करें। मुझे देखें, घरवाले डॉक्टर या वकील बनाना चाहते थे, मैं पेंटर बनना चाहता था। वो आज भी खुश नहीं हैं, पर मैं पूर्ण संतुष्ट। खूब फिल्में देखता हूं, किताबें पढ़ता हूं। बच्चों को बताता हूं कि इसमें अच्छा क्या देखा-सीखा।
सऊदी अरब में खुलते बीयर बारों के बहाने समाज पर तंज कसने के साथ बातों का सफर सशरीर संगम तक आ पहुंचा है। यहां की चकाचौंध वाली दुनिया देखकर चकित हैं। कार से उतरते हैं कि मिर्जापुर से सात लोगों के परिवार के साथ माघ मेले में आई छोटी-सी बच्ची मासूमियत से दीये का थाल बढ़ा देती है। बिना देरी..बिना देखे दो सिक्के थाल में डाल देते हैं।
संगम नोज के पास रेत पर बैठे दो युवाओं को लाल रंग का एक-डेढ़ फीट ऊंचा फल लिए देख ठिठके...। पूछा क्या है...जवाब मिला-रामफल...जिसे रामजी वनवास में खाकर रहे थे। 20 रुपये की छह फांकें ली हैं। ...खाए और मुस्कुराकर बोले, बहुत मीठा है, मजेदार...।