मामला गाजीपुर जिले का है। याचियों ने भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 219 के तहत पुनर्विचार याचिका दायर की थी। जिसे 29 जनवरी 2016 को पुनर्विचार प्राधिकारी ने एकपक्षीय आदेश पारित कर खारिज कर दिया। वर्ष 2022 में देरी माफी की अर्जी के साथ इस आदेश के पुनर्स्थापना का प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकील पर मुकदमे की जानकारी न देने वाली याचिका दाखिल करने में देरी की माफी देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि छह साल तक वकील से संपर्क न करने वाला पक्षकार देरी माफी का हकदार नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति विकास बुधवार की खंडपीठ ने जगदीश और अन्य की ओर से दाखिल विशेष अपील पर सुनाया।
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मामला गाजीपुर जिले का है। याचियों ने भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 219 के तहत पुनर्विचार याचिका दायर की थी। जिसे 29 जनवरी 2016 को पुनर्विचार प्राधिकारी ने एकपक्षीय आदेश पारित कर खारिज कर दिया। वर्ष 2022 में देरी माफी की अर्जी के साथ इस आदेश के पुनर्स्थापना का प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया। देरी माफी की अर्जी में याचियों ने आरोप लगाया कि उनके वकील ने उन्हें पुनर्विचार प्राधिकारी के एकपक्षीय आदेश की जानकारी मुहैया नहीं कराई। वाराणसी मंडल के अपर आयुक्त (न्यायिक) की अदालत ने 10 अक्तूबर 2023 को पुनर्स्थापना का प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया। इस आदेश के खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने वाराणसी मंडल के अपर आयुक्त (न्यायिक) की अदालत का आदेश बहाल करते हुए याचिका खारिज कर दी। एकल पीठ के आदेश के खिलाफ याचियाें ने विशेष अपील दाखिल की। सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि पुनर्स्थापना याचिका और अपील दाखिल करने में देरी की गई है। इस देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण देने के बजाय अपने वकील पर मुकदमे की जानकारी न देने का आरोप लगाया गया है। अपने इस दावे के समर्थन में याची यह साबित करने में असफल रहा कि उसने पिछले छह वर्षों में अपने अधिवक्ता से किस तरह संपर्क किया कि उन्हाेंने मुकदमे की जानकारी नहीं दी। खंडपीठ ने विशेष अपील खारिज करते हुए कहा कि छह साल तक वकील से संपर्क न करने वाला पक्षकार देरी माफी का हकदार नहीं हो सकता है।