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Gopaldas Neeraj: नीरज के बीए का प्रमाण-पत्र, कपड़े, पुरस्कार, टेप रिकॉर्डर, जूते बयां करते हैं उनकी शख्सियत

Thu, 04 Jan 2024 01:17 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

संग्रहालय में गोपालदास नीरज के बीए का प्रमाण पत्र, कपड़े, जूते, वीसीआर, टेप रिकॉर्डर, निजो एस कैमरा, लैंड लाइन फोन, छड़ी, ट्राई साइकिल, पद्मश्री, पद्मभूषण, यश भारती सम्मान पत्र भी है। बीड़ी, लाइटर भी है। ओशो, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव सहित अन्य के साथ उनकी तस्वीरें हैं। शीशे में रखीं किताबें और सम्मान उनके व्यक्तित्व को विराट करती हैं। 
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महाकवि गोपालदास नीरज - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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गीतकार गोपालदास नीरज की स्मृति में अलीगढ़ के रघुवीर सहाय इंटर कॉलेज में नीरज संग्रहालय बन गया है। इस संग्रहालय में नीरज जी से जुड़ी चीजों के अलावा उनके इस्तेमाल की गई वस्तुएं भी रखी गई हैं। इन्हें देखकर इसके लोकार्पण के समय मौजूद लोग निहाल हो गए। यह संग्रहालय नीरज के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध करने वालों के लिए खास तौर पर उपयोगी होगा।

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संग्रहालय में नीरज के बीए का प्रमाण पत्र, कपड़े, जूते, वीसीआर, टेप रिकॉर्डर, निजो एस कैमरा, लैंड लाइन फोन, छड़ी, ट्राई साइकिल, पद्मश्री, पद्मभूषण, यश भारती सम्मान पत्र भी है। बीड़ी, लाइटर भी है। ओशो, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव सहित अन्य के साथ उनकी तस्वीरें हैं। शीशे में रखीं किताबें और सम्मान उनके व्यक्तित्व को विराट करती हैं। अभी भी बहुत पुरस्कार हैं, जो संग्रहालय में नहीं हैं। इनमें फिल्म फेयर सहित अन्य पुरस्कार शामिल हैं। संग्रहालय में जो चीजें रखी गई हैं, उससे अगर कोई नीरज जी पर शोध करना चाहे तो वह कर सकता है। इस संग्रहालय में और भी नीरज जी से जुड़े सामान रखे जाएंगे। संग्रहालय में चार पीढ़ी की तस्वीर भी हैं, जिसमें नीरज जी और उनके बेटे मिलन प्रभात, मिलन के बेटे पल्लव और उनका बेटा है। मिलन प्रभात ने बताया कि संग्रहालय में और वस्तुएं रखी जाएंगी। उनकी पत्नी रंजना ने कहा कि संग्रहालय का सपना पूरा हो गया है। इसके लिए कॉलेज प्रबंध समिति को बधाई देती हूं।

आईजी शलभ ने किया संग्रहालय का लोकार्पण
पद्म भूषण डॉ. गोपाल दास नीरज ट्रस्ट व रघुवीर सहाय इंटर कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में पद्म भूषण गोपालदास नीरज संग्रहालय का लोकार्पण पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) शलभ माथुर ने किया। आईजी ने कहा कि अलीगढ़ के अंदर नीरज जी जैसी महान शख्सियत की स्मृति में स्थापित यह संग्रहालय अद्भुत है। नीरज जी के व्यक्तित्व से नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी। स्वामी पूर्णानंद पुरी महाराज ने कहा कि नीरज जी वर्तमान के व्यास थे। वरिष्ठ कवि सुरेंद्र सुकुमार ने कहा कि नीरज जी को अहंकार छू नहीं पाया था। डॉ. एचएन सिंह ने कहा कि नीरज जी एक बहुआयामी, गंभीर ,अध्ययनशील और गतिशील व्यक्तित्व के धनी रचनाकार थे।
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रघुवीर सहाय इंटर कॉलेज व केपी समिति के अध्यक्ष अशोक सक्सेना ने कहा कि नीरज जी ने सदैव परिवार के लोगों, गरीब बच्चों की गुपचुप तरीके से मदद की। नीरज जी एक कवि ही नहीं, एक सच्चे समाजसेवी भी थे। प्रबंधक सुभाष चंद्र सक्सेना ने कहा कि नीरज जी का इस विद्यालय के साथ गहरा रिश्ता रहा है। उनकी धर्मपत्नी ने इस विद्यालय में एक अतिथि गृह का निर्माण भी कराया था। नीरज जी के पुत्र व नीरज ट्रस्ट के अध्यक्ष मिलन प्रभात ने नीरज जी के कृतित्व की चर्चा की। संचालन नीरज ट्रस्ट के महासचिव डॉ. राकेश सक्सेना ने किया। कॉलेज के प्रधानाचार्य दिनेश कुमार सिंह ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। यहां उप प्रधानाचार्य प्रदीप कुमार, केपी समिति के कोषाध्यक्ष आकाश सक्सेना, कार्यकारिणी सदस्य राज सक्सेना आदि मौजूद रहे।

...कोई सानी नहीं है गीतकार नीरज का

रघुवीर सहाय इंटर कॉलेज में काव्य गोष्ठी भी हुई। कवि अशोक अंजुम ने सुनाया-कौन छू पाएगा जो है वकार नीरज का, कोई सानी नहीं है गीतकार नीरज का। कवि हरीश बेताब ने पढ़ा- सारे जगत में गीत की पहचान थे नीरज, हम सबका मान और स्वाभिमान थे नीरज । शायर जॉनी फॉस्टर ने सुनाया-नफरत के जहरीले बादल दूर हटा दे या मौला, प्यार मुहब्बत हमदर्दी के फूल खिला दे या मौला। दीप किशोर सक्सेना, पूनम अस्थाना, मधु शर्मा ने भी गीत प्रस्तुत किए। यहां केपी सोसायटी के सचिव देवेंद्र सक्सेना, प्रचारक विक्रांत, आचार्य गौरव शास्त्री, डॉ. मधु आंधीवाल, अलका बंसल, एसपी भांति, रंजना सक्सेना, डॉ. आभा जौहरी आदि मौजूद रहे।

परिचय 
जन्म : 4 जनवरी 1925, इटावा
मृत्यु : 19 जुलाई 2018, एम्स नई दिल्ली
पुरस्कार : पद्मश्री, पद्मभूषण, यश भारती, फिल्म फेयर पुरस्कार आदि


भावुक इटावी के नाम से मंचों पर नीरज ने शुरुआती दौर में पढ़ी कविता
“आवाज और मुद्रा में अलग-सी एक उमंग, उमगती-सी एक ख्वाहिश और टीसती-सी एक चुभन-''उफ, आज तो बैठ पाना भी...! इस तरह खड़े होकर तो. ..!'' लंबी होती जा रही उनकी इस चुप्पी के बीच मन हुआ कि नीरजजी को शुरू के दिनों के बारे में जाना जाये। पूछने पर की देर थी कि सुनाई दिया- ''मैंने 1941 से लिखना शुरू किया और तभी पहली कविता सोहनलाल द्विवेदी की अध्यक्षता में पढ़ी थी। तब नौवीं में था मैं ! फिर 1942 में दिल्ली का वो कवि सम्मेलन ! ढूंढते खोजते संयोजक के पास पहुंचा। उनसे कविता पढ़वाने का आग्रह किया। उन्होंने नाम पूछा तो बताया- भावुक। पूछा कहां से आए हो तो कह दिया कि इटावा से। वे बोले कि ठीक है, शुरू में पढ़वा देंगे। हम भी तो इटावा के हैं। वहां खूब जमे। पांच रुपये इनाम में भी मिले। हां-शुरू में भावुक '' इटावी के नाम से ही पढ़ी थीं कविताएं। इटावा के कुछ मित्रों ने कहा कि भावुक नाम अच्छा नहीं है तो बाद में नीरज नाम रखा। और यह, न्यूमरोलॉजी और हमारी कुंडली के हिसाब से इतना बढ़िया बैठा कि हम फिर नीरज ही हो गए”। नीरज अपने गीतों से जनमानस के दिलों पर राज करते हैं''

मेरे जाने के बाद सिंगसिंग करेगा घर की देखभाल
“अंदर से ठुनकते-रोते आते उस बच्चे ने जरा देर में वहां का सब कुछ बदल दिया था। सिंगसिंग से उसे खुद की गोद में ले लिया गया है-''देखो, प्यारा है-ये बाबा हमारा। अब देखो भागेगा- बदमाशी करेगा-उल्लू का पट्ठा। कल मेरी अंगुली काट ली थी इसने !'' बिल्कुल बच्चा होकर, बच्चे की तरह तुतलाकर बातें शुरू की ही थीं कि ''अरे, लो भई मेरे इसने पेशाब कर ली!'''''''' उस बच्चे के सौभाग्य पर खुश होने के बीच में सोच रहा था कि क्या नीरजजी को अपने पुत्र गुंजन के संग इस तरह खेल की फुर्सत मिली होगी ? जी-अजीब-सा रिश्ता है सिंगसिंग का नीरजजी से। बचपन से यहीं पला। यहीं शादी हुई। इस घर में आए, हर बदलाव का साक्षी रहा। नीरजजी का एडीसी, ड्राइवर, रसोइया, पुतइया, सेवक, अभिभावक, इलेक्ट्रीशियन आदि न जाने क्या-क्या बनकर रहा है वह। अब उसकी पत्नी ज्योति ने आकर उसके कई काम बांट लिए हैं। उसका असली नाम-सुरेंद्र का बहुत कम लोगों को पता है और अब तो इस सिंगसिंग का महत्व इसलिए और भी बढ़ गया है कि नीरज जी ने उसे अपने घर का विधिवत केयर-टेकर भी घोषित कर दिया है-यानी उनके बाद इस घर की देखभाल सिंगसिंग ही करेगा। सिंगसिंग बच्चे को उसकी मां के पास छोड़ने गया है। अपने कपड़ाें या बिस्तर के भीगने से बेफिक्र नीरज बच्चे के रोने की हंसी उड़ा-उड़ाकर हंसे जा रहे हैं”।
(दोनों उद्धरण साक्षात्कार विधा के विशेषज्ञ वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम कुमार द्वारा नीरज के साथ गुजारे गए दुर्लभ क्षणों पर आधारित लंबे रेखाचित्र के अंश हैं)

गीतों के राजकुमार नीरज दिलों पर बादशाह की तरह कर रहे राज

रुमानी गीतों के राजकुमार और काव्य मंचों के बेताज बादशाह गोपालदास नीरज आज भी काव्य प्रेमियों के दिलों पर राज कर रहे हैं। 4 जनवरी 1925 को इटावा में जन्मे गोपालदास नीरज ने अलीगढ़ को कर्मस्थली बनाया। डीएस कॉलेज के हिंदी विभाग में उन्होंने बतौर शिक्षक के रूप में पढ़ाया भी। पढ़ने के बजाय उनका मन फिल्मों में गीत लिखने और मंच पर कविता पढ़ने में लगा। उनका साहित्य के क्षेत्र में अहम योगदान रहा। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, यश भारती, फिल्म फेयर सहित आदि पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्होंने आखिरी सांस एम्स नई दिल्ली 19 फरवरी 2018 को ली थी। भले ही वह सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे कालजयी गीत आज भी उनकी मौजूदगी का आभास कराती है। उनकी जयंती पर वरिष्ठ साहित्यकारों से लेकर उनके प्रशंसकों ने उन्हें बड़ा दिल वाला इंसान के साथ एक बेहतरीन कवि-गीतका भी बताया है।

नीरज हिंदी कविता की गीत-काव्य परंपरा के सशक्त संवाहक हैं। उन्होंने न केवल हिंदी की गीत-रचना में एक बड़ा मानदंड स्थापित करते हुए गीतिविधा को लोकप्रियता के उच्चशिखर पर स्थापित किया, बल्कि गीत से हिंदी पाठकों और श्रोताओं को व्यापक रूप से जोड़ने का कार्य किया! हिंदी कविता में गीत का पूर्ण विकास छायावादी युग में माना जाता है। उसके बाद ‘प्रगतिवाद ‘ और ‘प्रयोगवाद’ के युग में अतुकांत रचनाओं के कारण गीत की धार क्षीण और मंद होने लगी। ऐसे में गीत-काव्य के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगने लगे, जहां ‘दिनकर’ जैसे बड़े कवि गीत के विरोध में खड़े हो गए। ऐसी स्थिति में ‘बच्चन’ और ‘नीरज’ जैसे कवि गीत के पक्ष में प्रमुखता से पैरोकारी में सामने आए। नीरज के गीत और उनकी लोकप्रियता ‘ दिनकर’ के उस आरोप का उत्तर भी है, जिसमें उन्होंने आशंका व्यक्त की थी-“ क्या गीत मर गया है?” नीरज ने अपने गीतों के माध्यम ‘ दिनकर’ की आशंका का उत्तर दिया-“ गीत कभी मर नहीं सकता। साहित्यकारों ने उन पर लिखा और अनेक विश्वविद्यालयों में उन पर शोधकार्य किए गए या किए जा रहे हैं। लोक और जनमानस में नीरज को अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई। फिल्मों से लेकर मंचों तक अपने गीतों से जनता के दिलों पर राज करनेवाले नीरज का हिंदी कविता में वास्तविक मूल्यांकन होना अभी शेष है, पर जनमानस में वे नि:संदेह अमर हैं! अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहा जाए, तो—“ निगाहें कामिलों पर पड़ ही जाती हैं ज़माने की कहीं छुपता है ‘अकबर’ फूल पत्तों में निहां होकर”-प्रो. शंभुनाथ तिवारी, हिंदी विभाग, एएमयू

सदियों में किसी कवि को चुनती
भाव, लय और शब्द की जैसी एकान्विति नीरज को सिद्ध थी, वह सदियों में किसी कवि को चुनती है। वैसे तो उन्हीं के शब्दों में- ''''मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य'''', किंतु ऐसा सौभाग्य किसी-किसी को ही हासिल होता है। आध्यात्मिक रुचि के नीरज का मन मानव-दर्दों को अनेकविध रूप में महसूस करता था और उनके मनन का यही विषय था। ''''सत्य'''' किसी एक के पास नहीं है, वह मानव-जाति की थाती है और मनुष्य-मनुष्य के हृदय में बिखरा हुआ है। इस सत्य को प्रेम से जाना-पहचाना जा सकता है और जानना-पहचानना ही काफी नहीं है, उसे मांस-मज्जा की तरह अपना हिस्सा बनाना जरूरी है। जब वह इस रूप में आ जाता है तो कविता का भाव बन जाता है और भाव-तीव्रता लय पकड़कर शब्दों में बह पड़ती है-नीरज की ऐसी मान्यता है और भाव-लय-शब्द की जिस एकान्विति का पहले जिक्र किया गया है, वह नीरज के काव्य में महसूस की जा सकती है। -अजय बिसारिया, हिंदी विभाग, एएमयू

उन गीतों ने जिनमें मेरा दर्द छिपा है
नीरज की पाती आई है, नीरज की पाती आई है, दर्द दिया है, उन गीतों ने जिनमें मेरा दर्द छिपा है, वो तो अपने गीत सुनाकर चला गया है आर यहां मैं सो रहा हूं इन्सानों को मैं कैसे इन्सान बनाऊं, मैंने उसका शोक गीत भी लिख डाला है, नीरज की पाती है।-महताब हैदर नकवी, उर्दू विभाग, एएमयू
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नीरज पुरस्कार मिलना सौभाग्य की बात

अद्भुत व्यक्तित्व था नीरज जी का। जिस मंच पर उनकी उपस्थिति होती थी , केंद्र में वही रहते। अलीगढ़ ही डॉ. नरेंद्र तिवारी द्वारा आयोजित 1987 की एक काव्य- गोष्ठी में प्रथम बार नीरज जी के सानिध्य में काव्य-पाठ का अवसर मिला था। उसके बाद तो यह सिलसिला निरंतर चलता ही रहा। मेरे संयोजन में कासिमपुर पावर हाउस में सन् 1992 में आयोजित कवि सम्मेलन में नीरज जी द्वारा मेरी पहली किताब 'भानुमती का पिटारा' का लोकार्पण हुआ। इस कवि सम्मेलन में मेरे काव्य-पाठ से इतने प्रभावित हुए कि अपने गले से माला उतार कर मेरे गले में पहना दी। इसके बाद तो मेरी कई किताबों यथा- एक नदी प्यासी, प्रिया तुम्हारा गांव, दोहा दशक, अशोक अंजुम : रोशनी का घट' आदि का लोकार्पण नीरज जी के कर कमलों से ही सम्पन्न हुआ। मेरी कई किताबों की भूमिका नीरज जी ने लिखी। नुमाइश कवि सम्मेलन के संयोजक रहते हुए उन्होंने प्रायः मुझे मंच पर स्थान दिया। 2013 में नुमाइश प्रशासन द्वारा प्रदत्त एक लाख एक हजार रुपये का ''नीरज पुरस्कार'' नीरज जी के ही करकमलों से मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। -अशोक अंजुम, साहित्यकार

नीरज जी मिला आशीर्वाद
उनकी शवयात्रा आगरा और अलीगढ़ में निकली। अकेले ये ऐसे महापुरुष थे, जिनकी दो स्थानों पर शवयात्रा निकली। नीरज जी को ज्योतिष व रत्न शास्त्र का भी ज्ञान था। वे नवरत्न की अंगूठी पहनते थे। मैंने उनसे कहा कि इसमें तो बहुत अच्छी गुणवत्ता के रत्न हैं, तो बोले तू क्या जौहरी है तो मैंने कहा कि ये मेरा पुश्तैनी कार्य है तो उन्होंने खुश होकर इस व्यवसाय में भी मेरी मदद की।-अनिल वर्मा, नीरजजी के प्रशंसक

नीरजजी ने लिखे लोकप्रिय व कर्णप्रिय गीत
नीरज जी के सानिध्य में 30 वर्ष तक रहे। नीरज जी ‘‘प्रेम के पुजारी’’ और ‘‘रस’’ के भिखारी थे। देवानंद से इनकी मित्रता हुई और उनकी 4-5 फिल्मों में बेहद लोकप्रिय व कर्णप्रिय गीत लिखे। उनकी यह खासियत रही कि उन्होंने हिंदी की सभी विधाओं में रचनाएं लिखी उनका कहना था कि मानव होना भाग्य है और कृषि होना सौभाग्य। ‘‘ऐ भाई जरा देख के चलो’’ गीत आज जीवन का मुहावरा बन गया है।-डॉ. सीके आंधीवाल, नीरज के प्रशंसक

नीरजजी के कविताओं में प्रेम अहम तत्व
गोपालदास सक्सेना नीरज ने न सिर्फ फिल्मों में यादगार गीत लिखकर अनेकों अवार्ड जीते हैं। उनके कविताओं के कई संकलन प्रकाशित हुए हैं, जिनमें दर्द क्या है, प्राण गीत, आसावरी, नदी किनारे लहर पुकारे, बादर बरस गओ और अंर्तध्वनि प्रमुख हैं। जहां तक फिल्मों का संबंध है। उन्होंने मेरा नाम जोकर, प्रेम पुजारी, शर्मीली और गैंबलर जैसी यादगार फिल्मों के गीत लिखे हैं। उनकी कविताओं में प्रेम बहुत अहम तत्व है। उन्होंने हर तरह की संकीर्ण विचारधाराओं के खिलाफ कविताएं लिखी है। मानवता उनके लिए सबसे बड़ा धर्म है, वह प्राण गीत में लिखते हैं।-प्रो. आसिफ सिद्दीकी, अध्यक्ष, अंग्रेजी विभाग, एएमयू
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