मौजूदा समय में मानसून सीजन में शहर को सबसे ज्यादा दर्द जलभराव ही देता है। अलीगढ़ में जलभराव की समस्या काफी पुरानी है।1871 और 1874 में शहर में भारी बारिश हुई थी। इसके असर से पूरे शहर में जलभराव की स्थिति पैदा हो गई थी। आम लोगों को काफी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा था। लेकिन अंग्रेज मानते थे कि इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। मौजूदा प्रशासन भी चाहे तो अंग्रेजों के समाधान की मदद ले सकता है। शहर के आवासीय घर ज्यादातर पक्की ईंटों से बने थे। मिट्टी के घरों की संख्या भी ज्यादा थी।
कोल में थे 101 मोहल्ले
कोल टाउन में मोहल्लों की संख्या 101 थी। टाउन का बड़ा हिस्सा सरायों से बदली रिहायसों में तब्दील हुआ था। दिल्ली, मथुरा, आगरा, रुहेलखंड आदि स्थानों पर आनेजाने वाले राहगीरों के लिए यह इलाका विश्राम स्थल अथवा सराय के तौर पर मशहूर था। इनके नाम भी बाबू की सराय, हाकिम की सराय जैसे थे। उत्तरी हिस्से के बाजार का नाम मियां गंज था। एक अंग्रेज अफसर के नाम पर इसी से सटे बाजार का नाम पेरोनगंज रखा गया था। जिले के पहले अंग्रेज कलेक्टर क्लाउड रसेल के नाम पर एक बाजार का नाम रसेलगंज रखा गया था। अंग्रेजों की प्रतिस्पर्धा में हाकिम असद अली ने अपने नाम की एक सराय बनवाई थी। प्रशासनिक रिपोर्ट तैयार करने में अंग्रेजों ने ईमानदारी बरती और साफ लिखा कि पेरोन और डी बोइन नामक अफसरों ने शहर के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया। दोनों अफसरों की कोठियां टाउन के बाहर साहिब बाग में थीं।
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स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)