1890 तक मृत्यु की सबसे बड़ी वजह बुखार थी। बीमारियों की फेहरिस्त में यह सबसे ऊपर था। 1837 में जिले के में मलेरिया बुखार बड़ी तेजी से फैला। इसी साल सासनी में घातक टॉयफाइड बुखार का प्रकोप भी देखने को मिला। इसका असर पूरे छह महीने तक रहा। बताया गया कि यह मुंबई (बंबई) से आने वाले यात्रियों की वजह से फैला था। कुछ लोग इसकी वजह मानते थे कि एक जाति विशेष के लोगों ने मरी हुई गाय का मांस खाया था जो संक्रामक रोग से ग्रस्त थी। 1856 में एक और महामारी तेजी से फैली। इसने 34000 लोगों की जान ली थी। इसके बाद 1861 में कोल और हरदुआगंज में तेजी से रहस्यमय बुखार फैला। अप्रैल-मई में इसका प्रकोप होने की वजह से एक अफवाह यह भी फैलाई गई कि यह रबी की नई फसल वाले अनाज खाने से हो रही है। सबसे बड़ी बुखार की महामारी 1879 में फैली जिसने जिले के 121868 लोगों की जान ले ली। 1881 से 1890 के दौरान औसतन हर साल 29058 लोगों ने बुखार के चलते जान गंवाई। यह संख्या जिले के कुल मृत्युदर का 84.51 फीसदी थी। उल्टी-दस्त भी जिले में जानलेवा बीमारी के रूप में जानी जाती थी।
कॉलरा और चेचक
कॉलरा का प्रसार सबसे पहले 1817 में देखने में आया था। लेकिन खुद अंग्रेज मानते थे कि इस बीमारी का वजूद पहले से रहा होगा। 1821 में इसका प्रकोप इस कदर बढ़ गया था कि अंग्रेज लिखते हैं कि शवों को जलाने के लिए जिले में लकड़ियां कम पड़ गई थीं। इसके बाद 1827 और अकाल के वर्ष 1837 में भी इसका प्रकोप पूरे जिले में सामने आया था। स्मॉल पॉक्स अथवा चेचक 1850 में तेजी से फैली थी। इसके बाद 1869, 1873, 1879 में चेचक का प्रकोप काफी बढ़ा हुआ था। 1879 में चेचक ने 8311 जानें ली थीं। 1881 से 1890 के दौरान चेचक से हर साल औसतन 772 व्यक्तियों ने जान गंवाई। 1896 में जिले में अकाल का व्यापक असर था। चेचक के मामलों में वृद्धि भी देखने को मिली थी। अंग्रेजों ने चेचक के टीके भी लगवाने शुरू किए थे। 1873 में 14743 लोगों को टीके लगाए गए थे। 1907 आते-आते जिले में चेचक के टीके लगवाने वालों की संख्या 41849 तक पहुंच गई। टीकाकरण के मामले में अलीगढ़ संयुक्त प्रांत (मौजूदा उत्तर प्रदेश) अन्य जिलों में अग्रणी था।
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)