मैनपुरी। शहर के मोहल्ला गाड़ीवान स्थित प्राचीन श्री भीमसेन महाराज मंदिर वर्षों पुराना है। मंदिर अपने आप में पौराणिक गाथाएं और किवदंतियां समेटे हुए है। वैसे तो मंदिर में प्रत्येक सोमवार को भक्तों का सैलाब उमड़ता है लेकिन महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार में मेले जैसा नजारा होता है। मान्यता है कि यहां अज्ञातवास के दौरान धर्मराज युधिष्ठिर ने भाइयों के साथ भगवान भीमसेन की पूजा की थी। महर्षि मार्कंडेय ने भी भगवान भीमसेन की साधना की थी।
मोहल्ला गाड़ीवान स्थित भगवान श्री भीमसेन महाराज का मंदिर तो 12वीं शताब्दी में अपने स्वरूप में आया लेकिन भगवान भीमसेन का विग्रह पौराणिक काल का बताया जाता है। शहर के ईशान कोण में जहां मां शीतला देवी का मंदिर है वहीं आग्नेय कोण में भगवान भीमसेन विराजमान हैं। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच इस पावन नगरी की रक्षा के लिए शिवा और शिव को विराजमान किया गया है। तीर्थस्थल बटेश्वर की भांति यहां भी भगवान शिव की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है। विग्रह में बड़े-बड़े जटा जूट से अलंकृत चंद्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले एवं बड़ी-बड़ी मूंछों से सुशोभित शिव का रूपांकन किया गया है। श्री भीमसेन मंदिर के बारे में किवदंती है कि अज्ञातवास के दौरान इच्छु नदी (वर्तमान में ईशन) के किनारे-किनारे बिठूर जाते समय पांडव यहां रुके थे।
संत गुलाब खां की मजार की भी होती है पूजा
किवदंती है कि करीब 200 वर्ष पूर्व भीमसेन मंदिर में महाशिवरात्रि पर भंडारा चल रहा था। इसी दौरान मुस्लिम संत गुलाब खां आए और कमंडल में खीर देने को कहा। खीर परोसने वाले कमंडल में खीर डालते रहे लेकिन कमंडल नहीं भरा। जब यह बात पुजारी नरोत्तमदास तक पहुंची तो वह स्वयं अपने कमंडल से खीर परोसने लगे लेकिन लोग यह देख कर दंग रह गए कि न तो गुलाब खां का कमंडल भर रहा और न ही नरोत्तमदास के कमंडल से खीर की धार टूट रही है। कहा जाता है कि दोनों संत गले मिले और तब से संत गुलाब खां भीमसेन मंदिर में ही रहने लगे। मंदिर परिसर में गुलाब खां की मजार बनी हुई है। श्रद्धालु मजार की भी पूजा करते हैं।