डॉक्टरों ने कहा था- अब नहीं हो सकता गर्भपात
जब मामला संज्ञान में आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। न्यायालय के आदेश पर पुत्री का गर्भपात कराने के लिए सीएमओ के निर्देशन में टीम का गठन किया गया। टीम ने न्यायालय को रिपोर्ट दी थी कि यदि गर्भपात कराया गया तो बेटी के जीवन को खतरा हो सकता है।
इसे देखते हुए पीड़ित पुत्री ने दुष्कर्मी पिता के बच्चे को जन्म दिया। एडीजीसी सुभाष चतुर्वेदी ने बताया कि जब मामला संज्ञान में आया तो उस समय 28 सप्ताह छह दिन का गर्भ था। इसके कारण पीड़िता का गर्भपात नहीं हो सका। उसे बच्चे को जन्म देना पड़ा।
पति को जेल भिजवाकर बेटी को दिलाया इंसाफ
दुष्कर्म के मामले में आरोपी पति को जेल भिजवाने के बाद पूरी जिम्मेदार पीड़िता की मां पर थी। लेकिन वह अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए चट्टान की तरफ खड़ी रही। तमाम दबावों को उसने दरकिनार कर दिया।
एक ही लक्ष्य था कि दुष्कर्मी को कर्मों की ऐसी सजा मिले, ताकि लोग सबक ले सकें। अपर सत्र न्यायाधीश विशेष न्यायाधीश पॉक्सो-2 जहेंद्र पाल सिंह ने पीड़िता के दोषी पिता को आखिरी सांस तक जेल में रहने की सजा सुनाई है।
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