आगरा विधानसभा चुनाव में प्रमुख दलों से टिकट की मांग करने वालों की लंबी कतार रही है। लेकिन अब तक अपने दमखम पर आगरा में आठ नेता विधायक बने हैं। जिले में आखिरी बार 1996 में फतेहपुर सीकरी विधानसभा से चौधरी बाबूलाल निर्दलीय विधायक चुने गए थे। उनके बाद से 25 साल से जिले की किसी भी विधानसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी विधायक नहीं बना है।
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चार विधायक चुने निर्दलीय
आजादी के बाद 1957 में हुए दूसरे चुनाव में सबसे ज्यादा चार विधायक निर्दलीय चुने गए थे। तब खेरागढ़, एत्मादपुर, फिरोजाबाद और बाह विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के प्रत्याशियों को हराकर निर्दलीय उम्मीदवार जीते थे। इनमें सबसे ज्यादा वोटों से बाह से राजा रिपुदमन सिंह ने जीत दर्ज की। उस समय उन्हें 34,721 वोट हासिल हुए थे, जो कुल मतदान के 64.47 फीसदी थे।
मिले थे इतने मत
किसी भी निर्दलीय विधायक को उनके बाद इतने वोट प्रतिशत हासिल नहीं हो पाये। उसके बाद 1962 में आगरा सिटी से बालोजी अग्रवाल, 1967 और 1969 में फिरोजाबाद सीट से राजाराम चुने गए। 1969 के बाद लगातार 27 साल तक कांग्रेस, जनसंघ, जनता पार्टी समेत दलों के विधायकों को ही चुना गया लेकिन 1996 में फतेहपुर सीकरी से चौ. बाबूलाल ने निर्दलीय विधायक के तौर पर जीत दर्ज की। पनवारी कांड के बाद चौधरी बाबूलाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 51.43 फीसदी वोट पाकर कांग्रेस के बच्चू सिंह और भाजपा के बदन सिंह को हराया।
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अब तक जीते निर्दलीय विधायक
साल विधानसभा विधायक वोट मिले
1957 खेरागढ़ श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल 19,411
1957 एत्मादपुर राम सिंह 27,366
1957 फिरोजाबाद जगन नाथ लाहिरी 16,498
1957 बाह राजा महेंद्र रिपुदमन सिंह 34,721
1962 आगरा सिटी-1 बालोजी अग्रवाल 20,032
1967 फिरोजाबाद राजाराम 25,490
1969 फिरोजाबाद राजाराम 31,541
1996 फतेहपुर सीकरी चौधरी बाबूलाल 56,612
निर्दलीय लड़कर दूसरे नंबर पर रहे
साल विधानसभा प्रत्याशी वोट
2002 दयालबाग चौधरी उदयभान सिंह 23,650
2002 फतेहपुर सीकरी राम निवास शर्मा 17,623
2007 फतेहाबाद अशोक दीक्षित 32,333
2012 फतेहपुर सीकरी राजकुमार चाहर 61,568
सीकरी से राजकुमार चाहर ने दी थी टक्कर
दस साल पहले फतेहपुर सीकरी विधानसभा में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर सबसे कांटे की लड़ाई हुई, जिसमें निर्दलीय प्रत्याशी राजकुमार चाहर को खूब वोट मिले लेकिन वह जीत नहीं सके । वह दूसरे नंबर पर रहे। वह बसपा प्रत्याशी ठाकुर सूरजपाल सिंह से 5623 वोटों से हार गए, लेकिन उनकी वजह से राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी चौधरी बाबूलाल 34,330 वोट पाकर तीसरे नंबर पर पहुंच गए और भाजपा के जितेंद्र फौजदार महज 6927 वोट पाकर पांचवें स्थान पर खिसक गए। राजकुमार चाहर तब भाजपा के टिकट के दावेदार थे। टिकट न मिलने पर निर्दलीय मैदान में उतरे थे।
अशोक दीक्षित ने बना दी त्रिकोणीय लड़ाई
2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा नेता अशोक दीक्षित को बसपा ने टिकट नहीं दिया तो वह निर्दलीय ही चुनाव में उतर गए। उन्हें तब 32,333 वोट मिले थे और तब भाजपा के राजेंद्र सिंह चुनाव जीत गए। उन्होंने छोटेलाल वर्मा को चुनाव हराया था और अशोक दीक्षित तीसरे नंबर पर रहे। इस चुनाव में फतेहाबाद में ब्राह्मण, ठाकुर और निषाद वोटरों ने जबरदस्त ताकत दिखाई।
जो सेवा करेगा, जीतेगा
जनता जनार्दन के बीच रहकर जो सेवा करेगा, वही जीतेगा। जब ऐसे व्यक्ति को टिकट नहीं मिलता तो लोगों को यह अपने साथ अन्याय लगता है और यही मेरे साथ हुआ। मैंने लोगों की लड़ाई लड़ी, जिस पर लोगों ने मुझे अपना प्रतिनिधि चुना। उस चुनाव ने मुझे बड़ी ताकत दी। - बाबूलाल, आखिरी निर्दलीय विधायक
मुझे मिले वोटों से जागा विश्वास
2012 में निर्दलीय विधायक के तौर पर चुनाव में जो वोट पाए, उसके बाद से मुझमें विश्वास जागा और लोगों के उसी प्यार का इनाम मुझे मिला, जब सांसद और फिर भाजपा किसान मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। जनता के बीच जो हमेशा रहेगा और मेहनत, लगाव बनाकर रखेगा, वह जनता के दिल-दिमाग पर बना रहता है। - राजकुमार चाहर, नंबर 2 रहे आखिरी निर्दलीय प्रत्याशी