उन्होंने कहा कि वर्ष 1963 में संस्थान की नींव रखी गई थी। यह तीन साल में तैयार हुआ। वर्ष 1976 को इसे भारतीय चिकित्सकों के सुपुर्द कर दिया गया। तब सिर्फ कुष्ठ रोग का ही इलाज होता था, अब टीबी का इलाज, कोविड जांच और शोध कार्य भी हो रहे हैं। नए अनुसंधान भवन देसिकन में विभिन्न बीमारियों पर शोध कार्य हो सकेगा।
साइकिल से गांव-गांव जाकर खोजते थे मरीज
कार्यक्रम को संस्थान के पहले भारतीय निदेशक रहे डॉ. केवी देसीकन ने भी संबोधित किया। डॉ. देसीकन के नाम पर ही नया भवन है। उन्होंने बताया कि वह 10 साल तक संस्थान के निदेशक रहे। मूल रूप से वह कर्नाटक के रहने वाले हैं और कुष्ठ रोगियों को पहले घृणा की दृष्टि से देखते थे।
जिम्मेदारी आने पर वह रोजाना साइकिल लेकर गांव-गांव जाकर कुष्ठ रोगियों को खोजते और इलाज करते, लोगों को जागरूक भी करते थे। केंद्रीय मंत्री ने उनको स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। पूर्व निदेशक डॉ. वेद भारद्वाज और डॉ. यूडी गुप्ता को भी सम्मानित किया गया।