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लेखन की कला ने कवि लाखन सिंह को बनाया मुक्तक सम्राट

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मैनपुरी। शहर से सटे भोजपुरा के रहने वाले लाखन सिंह भदौरिया सौमित्र को मुक्तक लेखन की वजह से मुक्तक सम्राट की उपाधि मिली। 93 साल के लाखन सिंह सादगी की जिंदगी जी रहे हैं। वृद्धावस्था के बाद भी हिंदी से जुड़े आयोजनों में आमंत्रण मिलने पर भागीदारी करना नहीं भूलते हैं। उनका हिंदी प्रेम नए साहित्यकारों और कवियों को प्रेरणा देता है।
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जिला इटावा के बरौली पार में सूबासिंह भदौरिया के घर तीन अगस्त 1928 को जन्मे लाखन सिंह भदौरिया मां की मृत्यु होने पर 12 साल की उम्र में अपनी विधवा ताई के पास उनके मायके भोजपुरा में आ गए। भोजपुरा में रहकर ही उन्होंने एमए तक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद प्रेम पाठशाला में शिक्षण कार्य किया और बाद में वहीं प्रधानाध्यापक बने। सरकारी सेवा से 1993 में बेसिक शिक्षा परिषद के जूनियर हाईस्कूल से उन्होंने सेवानिवृत्ति प्राप्त की। उन्होंने 1947 से ही कविताएं लिखना शुरू किया। शिक्षण कार्य के दौरान ही गीत, नवगीत, दोहा, सवैया, घनाक्षरी, कुंडलियां सहित नई कविता का भी लेखन किया। लेकिन मुक्तकों की रचनाओं ने उन्हें अलग ही ख्याति दिलाई। इसके लिए उन्हें मुक्तक सम्राट की उपाधि मिली। उनकी रचनाएं आकाशवाणी मथुरा और आगरा से भी प्रसारित हो चुकी हैं।
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साहित्य भूषण से किए गए सम्मानित
लाखन सिंह भदौरिया को वर्ष 2005 में उप्र हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा मुक्तक सम्राट की उपाधि देकर साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2013 में संस्थान द्वारा अवंती बाई पुरस्कार मिला। इसके अलावा विभिन्न मंचों पर भीमसेन शर्मा, गुलाबराय, गंगादेव, कवि भूषण, कवि रत्न, कवि कौशलेंद्र पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
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प्रकाशित रचनाएं
-अब तक माटी और मुक्तक- वर्ष 1964
-अपना दीप जलाओ- वर्ष 1967
-ज्योति के फूल- वर्ष 1971
-आंसू डूबी मुस्कानें- वर्ष 1986
-मुक्तक सौमित्र के- वर्ष 2004
-गीत मुक्तक सौमित्र के- वर्ष 2006
-छंद त्रिवेदी- वर्ष 2008
-जमादारिन- वर्ष 2016
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