अजीम शायर राहत इंदौरी की आगरा से बहुत यादें जुड़ी हुईं हैं। चित्रांशी मुशायरे में उन्हें फिराक अवार्ड दिया गया था। आगरा के कवि और शायरों ने उनके निधन को साहित्य के सितारे का जाना बताया। उनका कहना है कि राहत इंदौरी के शेर सिस्टम को आइना दिखाते थे, उनका अंदाज-ए-बयां सबसे अलग था। इससे उनकी बात सीधे दिल में उतरती थी। वो सन 2018 में अमर उजाला के मां तुझे प्रणाम मुशायरे में आए थे।
आगरा के मुशायरों में कई बार की शिरकत
शायर अमीर अहमद अकबराबादी ने बताया कि राहत इंदौरी ने उर्दू शायरी को बुलंदियों पर पहुंचाने का काम किया। मुशायरों में उन्हें अंत तक रोका जाता था, क्योंकि एक श्रोताओं का एक वर्ग उनकी शायरी खत्म होते ही मुशायरा छोड़कर चला जाता था। आगरा से उनका खास लगाव रहा। उन्होंने ताज महोत्सव के मंच से लेकर चित्रांशी के मुशायरों में कई बार शिरकत की।
2017 में चित्रांशी के मुशायरे में आए, तब राहत इंदौरी को फिराक अवार्ड से नवाजा गया। उन्होंने एक बार निजी बातचीत में बताया था कि यूं तो उन्होंने बहुत शेर लिखे हैं, लेकिन एक शेर ऐसा है, जो कि उनके दिल के करीब है। वह शेर था ‘रात की धड़कन जब तक जारी रहती है, सोते नहीं हम जिम्मेदारी रहती है।
संजीदगी में छुपा था व्यंग्य, करते थे आगरा को प्यार
हास्य कवि रमेश मुस्कान ने कहा कि राहत भाई का जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। उनकी संजीदगी में जो व्यंग्य छुपा था। उसे आज तक कोई शायर नहीं छू सका। आगरा से प्यार करते थे। आगरा के नाम पर पारिश्रमिक भी नहीं पूछते थे। वह बड़े प्यार करने वाले इंसान थे।
नए कवियों और शायरों को तवज्जो देते थे। उनकी शायरी सुनकर दाद देते थे। ‘बुलाती है मगर जाने का नहीं...’ फिर आप क्यों चले गए। बहुत याद आओगे। रमेश ने उनका एक शेर सुनाया ‘अफवाह थी कि मेरी तबीयत खराब है। लोगों ने पूछ-पूछकर बीमार कर दिया। दो गज सही मगर यह मेरी मिल्कियत तो है। ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।
मां तुझे प्रणाम के मुशायरे में आए थे
हास्य कवि पवन आगरी ने कहा कि सन 2018 में राहत इंदौरी अमर उजाला के मां तुझे प्रणाम के मुशायरे में शिरकत करने सूरसदन आए। दिसंबर में वो आखिरी बार आगरा आए। इस कवि सम्मेलन का संयोजन भी मेरे हाथ में था। दुर्भाग्य से इसके बाद वह आगरा नहीं आ सके।
राहत साहब अपने फन के अलग ही शायर थे। वो जिस हौसले के साथ अपनी शायरी में बेबाकी से सियासी तंज किया करते थे, उसका कोई जवाब नहीं है। मुझ पर उनका असीम स्नेह रहा। इसलिए नीरज जी के बाद उनका जाना ऐसा लग रहा है कि हम हिंदी और उर्दू के दो सरपरस्तों को खो बैठे हैं। उनकी सुधियों को नमन।
देश की मिट्टी से राहत को प्रेम था
मिर्जा वसीम बेग दिल ताजमहली ने कहा कि राहत इंदौरी का शायरी उर्दू नहीं हिंदुस्तानी शायरी है। उनके साथ 10-15 मर्तबा मंच साझा करने का मौका मिला। उन्हें देश की मिट्टी से प्यार था। वह मेरे घर पर भी आए। एक जिंदादिल इंसान और अजीम शायर को हमने खो दिया। कलेजा चाक हो गया खबर सुनकर।
उनके जाने से उर्दू का नहीं बल्कि साहित्य का बड़ा नुकसान हुआ है। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। उनकी शायरी बेमिसाल थी और वह मंच से तंज करने में कभी नहीं चूकते थे। आगरा वालों से उनका लगाव था, उनकी कमी हमेशा खलेगी।