फिरोजाबाद। आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि की जयंती धनतेरस के रूप में मनाई जाती है। वैश्विक महामारी कोरोना में आयुर्वेद की महत्ता को सभी ने माना है और यही कारण है कोरोना काल के बाद लोगों ने भी आयुर्वेद पर भरोसा जताना शुरू कर दिया है। इसके बावजूद भी सरकार जिले के आयुर्वेद चिकित्सालयों पर आज तक भरोसा नहीं जता सकी हैं। जिले के अधिकांश सरकारी आयुर्वेद चिकित्सालय बिना चिकित्सकों के सहारे संचालित हो रहे हैं। यहां तक अधिकांश आयुर्वेद चिकित्सालयों के पास खुद का भवन नहीं है। जर्जर किराए के भवनों में अस्पतालों को संचालित किया जा रहा है।
जिले में कुल 26 आयुर्वेदिक चिकित्सालय और दो यूनानी अस्पताल हैं। इनमें 14 चिकित्सकों की तैनाती के कारण शहर से लेकर देहात क्षेत्र के आयुर्वेद अस्पताल चिकित्सकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। इसके साथ ही सभी अस्पतालों में कुल मिलाकर नौ ही फार्मासिस्ट हैं। दवाएं भी चपरासी द्वारा ही वितरित की जाती हैं। स्थिति यह है कि आयुर्वेद चिकित्सालय सप्ताह में सिर्फ दो से तीन दिन ही खुल पाते हैं।
तीन पर सरकारी भवन, 23 किराए भवन में संचालित
जिले में राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालय नगला चूरा, जौंधरी और भारौल अस्पताल के पास ही सरकारी भवन हैं। शेष 23 आयुर्वेद अस्पताल किराए के भवन में संचालित हो रहे हैं। किराया भी 25 से 30 रुपये मासिक होने के कारण मकान स्वामी भवनों की मरम्मत नहीं कराते हैं। इस कारण कई अस्पताल जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं।
क्या कहते हैं चिकित्सक
- वैश्विक महामारी ने सिद्ध कर दिया कि आयुर्वेद पर भरोसेमंद दवा है। आयुर्वेद प्राचीनकाल से चल रहा है। कई मरीजों को हमने आयुर्वेद की दवा का सहारा लेकर ठीक किया है। आयुर्वेद नए शोध न होने और सरकारों की अनदेखी के कारण पिछड़ गया है। यदि आयुर्वेद पर बढ़ावा दिया जाए तो फायदेमंद साबित होगा।
डॉ. नागेंद्र माहेश्वरी, आयुर्वेद चिकित्सक
- आज भी लोग आयुर्वेद पर भरोसा करते हैं। सरकारी आयुर्वेद अस्पतालों में पूरे माह में 800 से 12 सौ लोगों की ओपीडी होती है। यह स्थिति तब है जब आयुर्वेद अस्पतालों में चिकित्सकों का अभाव है। कुल 26 अस्पतालों में 14 डॉक्टर हैं। यदि आयुर्वेद पर ध्यान दिया जाए तो मरीजों को फायदा मिलेगा।
डॉ. वीरेंद्र सिंह, जिला आयुर्वेद एवं यूनानी अधिकारी