मैनपुरी। विकास खंड घिरोर की ग्राम पंचायत विधूना स्थित मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर 19 नवंबर से लक्खी मेले का आयोजन होगा। यहां मेले की तैयारी शुरू हो गई हैं। दुकानें सजने लगी हैं।
घिरोर थाना क्षेत्र के गांव बिधूना स्थित मार्कंडेय मेले का इतिहास पुराना है। यहां प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा से मेले का शुभारंभ होता है, जो एक पखवाड़े तक चलता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां रात 12 बजे से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पवित्र सरोवर में डुबकी लगाते हैं। मेले का न केवल धार्मिक उद्देश्य है, बल्कि क्षेत्रीय लोगों के लिए भी इसका महत्व है। मेले में माटी, मटकी, लाठी, लकड़ी का सामान, लोहे का सामान, पत्थर का सामान सस्ती दरों पर मिलता है।
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ऐतिहासिक महत्व
मार्कंडेय ऋषि को सभी तीर्थों का भांजा कहा जाता है। यदि किसी तीर्थ का स्नान व दर्शन न कर पाएं तो मार्कंडेय ऋषि के दर्शन करें। वे सभी तीर्थों के मान्य हैं। इसलिए उनका महत्व बढ़ जाता है।
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महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास
विधूना का संबंध महाभारत काल से भी है। महाभारत काल में हुए विधुर का यहीं टीला था। उनके नाम से ही गांव का नाम बिधूना पड़ा। बताते हैं कि पांडवों ने अज्ञातवास के दिन यहीं व्यतीत किए थे। पांडवों के चबूतरों के अवशेष भी यहां मिलते हैं।
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रामायण काल से भी है संबंध
बिधूना से दो सौ मीटर की दूरी पर नहर के दूसरी तरफ सीता की रसोइया के रूप में मंदिर निर्मित है। पांच दशक पूर्व यहां वन था। इस स्थान को आज भी वनकटा के नाम से जाना जाता है। बताते हैं कि बाल्मीकि की यहीं कुटिया थी। सीता ने लवकुश को यहीं जन्म दिया था।
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समुद्र मंथन में हुआ था मथनी का प्रयोग
महर्षि मार्कंडेय के मुख्य मंदिर के सामने एक पत्थर की मथनी भी है। किवदंती है कि इस मथनी का प्रयोग समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। जो लोग मंदिर पर पूजा अर्चना करने जाते हैं वे मथनी की भी पूजा करते हैं।
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सरोवर में स्नान से दूर होता है चर्मरोग
मान्यता है कि यहां स्थित पवित्र सरोवर में स्नान करने से चर्मरोग दूर होता है। प्रदेशभर से लाखों की संख्या में लोग कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के लिए पहुंचते हैं। इसके अतिरिक्त वर्षभर की पूर्णिमा और सोमवती पर यहां लोग स्नान करने पहुंचते हैं।