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छात्र त्रस्त, जालसाज मस्त, जिम्मेदार पस्त

Tue, 26 Mar 2013 05:30 AM IST
Lucknow
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लखनऊ। प्रदेश सरकार के माध्यमिक शिक्षा विभाग की कमान सीधे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ में है। मुख्यमंत्री के हाथ के नीचे ही बोर्ड ऑफ हायर सेकेंडरी एजूकेशन दिल्ली के नाम पर फर्जीवाड़ा चलाया जा रहा है। बच्चों को फर्जी प्रमाणपत्र और अंकपत्र जारी किए जा रहे हैं। प्रदेश के 20 हजार से ज्यादा बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके बावजूद सब चुप हैं। माध्यमिक शिक्षा सचिव से लेकर माध्यमिक शिक्षा निदेशक तक ठोस कदम उठाने के बजाए अपना दामन बचाने में लगे हैं। इन सबके बीच फंसे 20 हजार बच्चों का क्या होगा? सभी इस सवाल से भागते नजर आ रहे हैं। दरअसल, इस अमान्य बोर्ड के फर्जीवाड़े के पीछे सत्ता दल से जुड़े कुछ नेता और शिक्षा माफियाओं की साठगांठ सामने आई है। वह इस पूरे मामले को उलझाने में लगे हैं। सिर्फ इसीलिए शासन में बैठे अधिकारी और विभाग इस बोर्ड को प्रदेश में अमान्य तो बता रहे हैं, लेकिन कार्रवाई की बात पर किनारा करने में लगे हैं। अमान्य बोर्ड ऑफ हायर सेकेंडरी एजूकेशन दिल्ली एक अस्तित्वहीन शिक्षा बोर्ड है। 1952 में सीबीएसई के गठन के साथ ही यह खत्म हो चुका था। यह बात माध्यमिक शिक्षा विभाग से लेकर माध्यमिक शिक्षा सचिव तक मानते हैं। माध्यमिक शिक्षा सचिव की ओर से जारी छह मार्च के शासनादेश में भी इसे स्वीकार किया गया है। माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश मंत्री डॉ.आरपी मिश्र सवाल उठाते हैं कि एक अस्तित्वहीन शिक्षा बोर्ड की ओर से प्रदेश भर में कैसे हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की अंक तालिकाएं और प्रमाणपत्र बांटे जा रहा रहे हैं? वर्ष 2005 से चल रहे शिक्षा बोर्ड के संचालन को प्रदेश में किसने अनुमति दी? शासन की अनुमति नहीं है तो सरकार की नाक के नीचे किसकी शह पर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है? उनकी मानें तो यह सारा खेल नेता, शिक्षा माफिया और अधिकारियों की सांठगांठ का ही नतीजा है।
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बोर्ड नहीं शासन जिम्मेदार ः माध्यमिक शिक्षा परिषद के निदेशक वासुदेव यादव बोर्ड ऑफ हायर सेकेंडरी एजूकेशन दिल्ली के खिलाफ कार्रवाई को शासन की जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं। उनकी मानें तो वह सिर्फ यूपी बोर्ड के लिए ही जिम्मेदार हैं। माध्यमिक शिक्षा परिषद की ओर से बोर्ड ऑफ हायर सेकेंडरी एजूकेशन दिल्ली की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की परीक्षा को समकक्षता प्रदान नहीं की गई है। बोर्ड ने इसे अस्तित्वहीन बता दिया है। इसके बाद भी यदि कोई इसका संचालन कर रहा है तो कार्रवाई शासन को करनी है। अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य का फैसला खुद करें। उधर, शासनादेश में बोर्ड ऑफ हायर सेकेंडरी एजूकेशन दिल्ली को अस्तित्वहीन और अमान्य बताने वाले माध्यमिक शिक्षा सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा अब बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। अपनी व्यस्तता का हवाला देकर सोमवार को पार्थ सारथी सेन शर्मा ने इस मुद्दे पर बात करने से भी इन्कार कर दिया। इस पूरे फर्जीवाड़े पर शासन का रुख स्पष्ट करने के बजाए उन्होंने इसे सरकार और माध्यमिक शिक्षा परिषद के समक्ष उठाए जाने की सलाह तक दी।
दो दर्जन जिलों में फैला जाल ः अमान्य बोर्ड ऑफ हायर सेकेंडरी एजूकेशन दिल्ली से संबद्घ विद्यालयों का संचालन सिर्फ राजधानी में ही नहीं बल्कि प्रदेश के दो दर्जन से ज्यादा जिलों में किया जा रहा है। इनमें मैनपुरी, गाजीपुर, प्रतापगढ़, फिरोजाबाद, मथुरा, बांदा, आगरा, मुरादाबाद, वाराणसी, गोंडा, कांशीराम नगर, बागपत, बदांयू, जालौन, मेरठ, अलीगढ़, फैजाबाद, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई और झांसी शामिल हैं। प्रदेश के पिछड़े इलाकों में इस बोर्ड से संबद्घता प्राप्त विद्यालय का मुख्य रूप से संचालन हो रहा है। आसानी से हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने की चाह रखने वाले युवा ही इसके फेर में फंसते हैं। बोर्ड के प्रदेश समन्वयक आरके श्रीवास्तव की ओर से प्रदेश भर में 150 से ज्यादा विद्यालयों को मान्यता बांटे जाने का दावा किया गया है।
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