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युवा खुद तय कर रहा अपना ट्रेंड

Mon, 25 Mar 2013 05:30 AM IST
Lucknow
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लखनऊ। साहित्य महोत्सव में युवा दिमाग की गुत्थियां सुलझाने की भी कोशिश हुई। हालांकि बतौर वक्ता तीन युवा लेखकों ने डिकोडिंग यंग माइंड्स पर चर्चा के दौरान यंग माइंड की अवधारणा को ही खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि युवा अपना ट्रेंड खुद तय करता है। इस दौरान सवालों की संस्कृति की वापसी की वकालत हुई तो इसके संभावित खतरों से भी आगाह किया गया।
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लेखक अमीष त्रिपाठी, जुगल मोदी और अप्पू पेन के साथ संवाद के संचालन की जिम्मेदारी संभाली नितिन प्रकाश ने। पैनल में तीनों लेखक थे इसलिए युवाओं की बातें भी किताबें और लेखन के बीच हुईं। अमीष ने कहा कि या तो दिमाग बंद होता है या खुला। जब आप दूसरे की असहमतियों को भी स्वीकारते हैं तो आप खुले दिमाग के हैं अन्यथा आपका दिमाग बंद है। यंग माइंड साहित्यिक जुमले के सिवा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अच्छा संकेत है कि युवा सवाल कर रहा है। यह हमारी पुरानी संस्कृति है जिसकी ओर लौटना होगा। लेखक अप्पू पेन सवालों की आजादी से तो सहमत दिखे लेकिन इसके खतरे भी बताए। उन्होंने कहा, युवा को चयन के लिए एकदम से नहीं छोड़ सकते। जब सेल में खरीद तक की सलाह दी जाती है तो बड़े फैसलों में तो मार्गदर्शन जरूरी ही है। जुगल मोदी का मानना था कि युवा को लेकर हम जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हैं। सही-गलत की परख और उसकी समझ पहले से बढ़ रही है।

मार्केट रिसर्च करके किताब नहीं लिखी जा सकती
अमीष त्रिपाठी ने शिव ट्रायलॉजी की आखिरी पुस्तक ‘ओथ ऑफ वायुपुत्रा’ को महोत्सव में लांच किया। उन्होंने कहा कि हमें लेखक और बिजनेसमैन दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है। मार्केट रिसर्च करके किताब नहीं लिखी जा सकती। किताब लिखते समय लेखक को दिल की ही सुननी चाहिए। उस समय हमें संपादक, प्रकाशक, आलोचक और यहां तक कि प्रकाशक की भी परवाह नहीं होनी चाहिए। लेकिन किताब छपने के बाद वह बिके इसके लिए प्रकाशक के साथ मार्केटिंग करने में हर्ज नहीं है। आखिर किसी ने आपकी किताब छापी है तो उसकी पूंजी नहीं डूबनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नब्बे के दशक में हुई घटनाओं ने उनका भगवान से विश्वास उठा दिया था लेकिन शिव ट्रायलॉजी ने मेरे यकीन को बदलने में मदद की। अमीष ने साफगोई से कहा कि धन और प्रसिद्धि अस्थायी हैं। लेकिन मध्यवर्ग के आदमी को लेखक बनने के लिए उसके बाद रोजी-रोटी की व्यवस्था होनी जरूरी है। मेरी दो किताबेें छपने तक मैं नौकरी कर रहा था। इससे आपको लेखन के साथ समझौता करने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा। मेरी पहली किताब छापने के लिए मुश्किल से एक प्रकाशक तैयार हुआ पर उसकी शर्त थी कि किताब से दार्शनिक आख्यान हटाया जाए। किताब छपवाना मेरी आर्थिक मजबूरी का हिस्सा नहीं था, इसलिए मैं उस प्रकाशक को मना करने का साहस कर सका।
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