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किसानों-मजदूरों के आंदोलन का मंच बने सिनेमा

Sat, 27 Oct 2012 12:00 PM IST
Lucknow
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के वाल्मीकि रंगशाला में शुक्रवार को ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ का फिल्म समारोह शुरू हुआ तो यह न सिर्फ समाज में प्रतिरोध की जरूरत को रेखांकित करने वाला रहा बल्कि अकादमी के पड़ोस के मल्टीप्लेक्स में चल रहे मुख्य धारा के सिनेमा का भी प्रतिरोध करता दिखा। जन संस्कृति मंच ने यहां दो दिवसीय पांचवां लखनऊ फिल्म समारोह आयोजित किया है।
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समारोह में पहली फिल्म देव रंजन सारंगी की वीडियो रिपोर्ट ‘विजिट टू वासागुडा’ दिखाई गई। यह वीडियो रिपोर्ट जून में छत्तीसगढ़ के वासागुडा में सीआरपीएफ द्वारा 17 आदिवासियों की हत्या के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दल के दौरे के दौरान तैयार की गई थी। यह रिपोर्ट आदिवासियों पर सुरक्षा बलों के अत्याचार का खुलासा करती है। इसके बाद रंगमंच और सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री जोहरा सहगल पर अनंत रैना की वृत्तचित्र दिखाई गई। यह फिल्म बहुत रोचक तरीके से जोहरा सहगल के जीवन, थियेटर और फिल्म के सफर और संघर्ष को बयां करती है। फिल्म का परिचय एपवा की उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने प्रस्तुत किया। समारोह में अंतिम फिल्म एमएस सथ्यू की फिल्म ‘गर्म हवा’ दिखाई गई। विभाजन की त्रासदी पर बनी यह फिल्म एक मुसलिम परिवार के आत्म संघर्ष की दास्तां है।
समारोह का उद्घाटन जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि सिनेमा जैसा जन माध्यम किसानाें, मजदूरों, महिलाओं, आदिवासियों के आंदोलन की अभिव्यक्ति का मंच बने। उन्होंने कहा कि हम इस समय सांस्कृतिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं जो राजनीतिक और आर्थिक संकट का ही प्रतिफल है। सरकार अमरीकी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में प्राकृतिक संसाधनों के लूट के खिलाफ संघर्षरत जनता का भीषण दमन कर रही है। आने वाले दिनों में यह दमन और तेज होगा। उन्होंने कहा कि वाम आंदोलन और संस्कृति के क्षेत्र में प्रगतिशील तहरीक अनेक धाराओं के बाद भी एक है। हमारी विरासत एक है। हमारी जो आपसी बहस है वह सही रास्ते की तलाश को लेकर है।
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गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक एवं जन संस्कृति मंच के प्रदेश सचिव मनोज कुमार सिंह ने बताया कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ की वर्ष 2006 से शुरू हुई यात्रा की चर्चा करते हुए कहा कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता के सुुख दुख और उसके संघर्ष का सिनेमा है। फिल्मकार नकुल स्वाने ने कहा कि मुख्यधारा के सिनेमा के नायक औैर उसके पात्र आज आम जनता नहीं अनिवासी भारतीय है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बालीवुड पूरी तरह पूंजी की गिरफ्त में आ गया है। अध्यक्षता कर रहे संस्कृतिकर्मी आरके सिन्हा ने भूमंडलीकरण के दौर में सांस्कृतिक चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि आज का सिनेमा सत्ता की संस्कृति का पोषण कर रहा है, जिसका मुकाबला जन प्रतिरोध की संस्कृति से ही हो सकता है। पटना से आई प्रसिद्ध सांस्कृतिक संस्था हिरावल के संतोष झा, समता राय, डीपी सोनी, अंकुर, राजेंद्र ने फैज अहमद फैज की नज्म, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, दिनेश कुमार शुक्ल की कविताओं की शानदार संगीतमय प्रस्तुति दी। संचालन भगवान स्वरूप कटियार ने किया।
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