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ई लड़ाई तौ चलैगी, बंद नाय होवे....

Wed, 24 Jul 2013 09:00 PM IST
बाह/आगरा/ब्यूरो
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वक्त के थपेड़ों की मार से चेहरे की लकीरें सख्त हो गई हैं और आंखें पथराई हैं। जिंदगी उनके लिए कभी नरम ही नहीं हुई तो वह कैसे होतीं। दो पल के सुकून की भी मोहलत नहीं मिली।
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हर कदम पर एक नई जंग खड़ी थी। आज भी खड़ी है और शकुंतला लड़ रही हैं। भरे गले से यही कह पाती हैं, ई लड़ाई तौ चलैगी, बंद नाय होवे।

कारगिल शहीद लायक सिंह की मां ने बेटे को देवता बना लिया तो वीर नारी शकुंतला ने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी होम कर दी। पति ने मातृभूमि का फर्ज अदा किया और शकुंतला ने मां का। जिंदगी भर दौड़ती रहीं।

53 वर्षीय शकुंतला से मिलने मैं ताजनगरी पहुंची। नींद के झोंके ने उन्हें छुआ ही था कि मैंने दरवाजे पर दस्तक दे दी। झल्लाई सी आवाज आई, कौन है। परिचय पाकर सहज भाव से अंदर लिवा लाईं। जब जिंदगी के पन्ने पलटने लगी तो सख्त सी दिखती शकुंतला बर्फ सी पिघल गईं।
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कहने लगीं, जिंदगी ने हमें बहुत भगायो है। कबहू कहीं नाय टिकन दयो। बे तो सीमा पै हते। तीन बच्चन की जिम्मेदारी हम पै हती। उनकी पढ़ाई के लाने इटावा जाय कै रहन लगे। पति के जावे के बाद यहां मकान मिल गयौ। बच्चन नै लैके अकेली रही। तब ई जगह बीयाबान हती।

वो समय कैसे काटौ, मत पूछौ। बहुत डरात हती। दिन भर तालौ लगाए रहती। डर के मारे नींद नाय आवती। 2003 में जौनपुर में पेट्रोल पंप मिलौ। बाय संभालवे के लाने खुद ही गए। दो बच्चा धौलपुर छोड़ दये। बड़ौ बेटा सोनू संग राखौ। वहां किराये कौ मकान लैके रहे। बच्चन के बड़ौ हैवे के बाद फिर यहीं आय गए। सबसे बड़ी बेटी रेनू की शादी कर दी। बड़ौ बेटा सोनू ट्रक कौ काम करात है और संजय पेट्रोल पंप संभाल रह्यो है।

लड़ाई की बताय कै नाय गए...
पति की शहादत का जिक्र आते ही शकुंतला की आंखें भर आईं। बोलीं, लड़ाई ते बीस दिना पहले यहां ते गए हते। हमें लड़ाई की नाय बताई। बस इतनी कही, नई जगह पोस्टिंग है गई है।

वर्दी और कपड़ों में बसी है उनकी महक
जब आंखों से दर्द का सोता फूटा तो जुबां खामोश हो गई। इस दर्द के आगे शब्दों की हैसियत ही कहां है। पति की निशानी के सवाल पर बस इतना ही कह पाईं, वर्दी और सारे कपड़े अब तक रखे हैं। शकुंतला अपना दर्द किसी से नहीं कह पातीं।

शादी के कुछ दिन बाद ही पति चले गए फौज में
मठौली, कानपुर की शकुंतला के हाथ 16 साल की उम्र में ही पीले हो गए। 6 महीने के गौना और 8 महीना के रौना के बाद वह अपनी ससुराल कोरथ आईं और कुछ दिन बाद पति फौज में चले गए। तीन या छ: महीने बाद ही छुट्टी मिलती। शकुंतला को उनकी यादों का सहारा था। फिर बगिया में फूल खिले। तीन बच्चों से लायक के घर का आंगन चहकने लगा। पति ने सीमा पर कमान संभाली और पत्नी ने बच्चों की अच्छी परवरिश की। पति की शहादत के समय उनकी बड़ी बेटी रेनू 18 साल की थी। मंझला बेटा सोनू 15 साल का और छोटा संजय 12 साल का था।
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