hockey player rani rampal
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तीनों ही पिछले एशियाई खेलों में कांसा, महिला टीम को रियो ओलंपिक के क्वॉलिफाई कर वहां देश की नुमाइंदगी और जापान में महिला एशिया कप जितवाने में अहम रोल निभाया।
देश का हॉकी में गौरव बढ़ाने के साथ रानी रामपाल, वंदना और नवजौत कौर को हॉकी में सरकार, राज्य सरकार या फिर हॉकी इंडिया पदक जीतने पर जो भी इनाम मिले उससे उन्होंने अपने परिवार , भाई और बहनों को बेहतर जीवन जीने के साधन मुहैया कर यह साबित किया कि भारत की ये बेटियां अपने परिवार के लिए बेटों से कहीं कम नहीं उनसे बढ़कर है।
मात्र 15 बरस की उम्र में भारत के लिए हॉकी खेल कर खास मुकाम हासिल करने वाली रानी रामपाल के पिता एक समय घोड़ा तांगा चलाकर उनके हॉकी खेलने के सपने को पूरा करने में उनका पूरा साथ दिया।
हरिद्वार में बीएचईएल के सटे रोशनाबाद गांव की वंदना कटारिया ने अपनी बड़ी बहन रीना कटारिया को हॉकी खेलते देखते हॉकी शुरू की। शुरू में लक्ष्मी विद्या मंदिर में खेली और लखनउ स्पोटर्स हॉस्टल में कोच विष्णु प्रकाश ने उन्हें अपने हॉकी कौशल को मांझने में मदद की। वंदना का भरा पूरा परिवार है। बहन रीना की शादी हो चुकी है और वह अपना परिवार बसा चुके है।
छोटी बहन खुशी हैं और वह खेल में रूचि रखती है। भाई सौरभ भी ताइकवांडो खेले और ताइकवांडो सिखाते हैं। सौरभ का अपना परिवार है। वंदना फख्र से यह बताती हैं हॉकी में वह जहां भी पहुंची अपने पिता नाहर सिंह के समर्थन के हॉकी खेलने के लिए की हौसलाअफजाई के कारण ही।
वंदना के परिवार की जो भी खेती की थोड़ी बहुत जमीन थी वह बीएचईएल के बनने के समय ही सरकार ने ले ली थी। अब वंदना के पिता नाहर सिंह अब बीएचईएल से रिटायर हो चुके हैं। भाईयों के अपने बाल बच्चे हैं और उन पर अपने परिवार को चलाने की जिम्मेदारी है। वंदना को इस सबसे कोई शिकायत नहीं है।
वंदना ने कहा, 'हॉकी से जो कुछ भी मिला है, मैंने अपने पिता नाहर सिंह के इलाज और घर की जरूरत को पूरा करने पर खर्च करती हूं। मेरे पापा नाहर सिंह ने तब हम बहनों को हॉकी खेलने की इजाजत दी जब हम पर गांव के लोग कटाक्ष करते थे। अब हालांकि अब ऐसा नहीं है। जब पिछले एशियाई खेलों में भारत की महिला हॉकी टीम की सदस्य के रूप में गांव लौटने पर सभी ने स्वागत किया और फिर एशिया कप जीतने पर हॉकी ही नहीं लड़कियों के किसी भी खेल को खेलने देने की आजादी देने की सोच पैदा हुई है।'
वंदना जैसी बेटी की परिवार की बेटे की तरह जिम्मेदारी निभाते देखना वाकई देश में ग्रामीण अंचलों में खेलने के प्रति नजरिए को बदल रहा है।
वहीं शाहबाद मरकंडा की नवजोत कौर कहती हैं वह आज हॉकी में जहां भी हैं अपने पिता सरदार सतनाम सिंह द्वारा खेलने के लिए दी गई पूरी आजादी के कारण हैं। नवजोत कौर को शाहबाद मरकंडा में हॉकी के बेहतरीन उस्ताद बलदेव सिंह के पास हॉकी सिखाने के लिए नवजोत के पिता सतनाम सिंह ले गए।
नवजोत कहती , 'हॉकी ने बतौर खिलाड़ी उन्हें नाम और इनाम सब कुछ दिया। पिता सतनाम सिंह और मां मनजीत कौर की वजह से मैं हॉकी में पूरी शिद्दत से खेल पाई। हॉकी से मुझे जो कुछ बड़े इनाम मिले जो कुछ भी पिता को सौंप दिया। मेरा छोटा भाई बलकरण ऑस्ट्रेलिया में आईटी इंजिनियरिंग कर रहा है। छोटी बहन नर्सिंग का कोर्स कर रही है।'
'मुझे फख्र है कि मैं हॉकी में इनाम में मिले पैसे परिवार में भाई बहनों की पढ़ाई में मदद करने में भागीदार बन पाई। मुझे खुद हॉकी खेलने को लेकर पड़ोस में कहीं किसी भी तरह की हल्की टिप्पणी या कटाक्ष जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। मां-पिता से कभी इस बाबत सुनने को नहीं मिला। उन्होंने मुझसे कभी इस बाबत कोई जिक्र नहीं किया।'
भारत की महिला हॉकी टीम के 2016 में रियो ओलंपिक में खेलने और पिछले साल महिला एशिया कप जीतने से पूरे शाहबाद ही नहीं बल्कि पूरे हरियाणा और देश में हम लड़कियों को और ज्यादा मान दिया जा रहा है।