कृष्णा खुलासा करते हैं कि वह पहले आम इंसानों के साथ खेलते थे और उन्होंने जिला स्तर का टूर्नामेंट भी जीता। दिसंबर 2017 में उन्हें पैरा बैडमिंटन के बारे में पता लगा। 2018 में वह राष्ट्रीय चैंपियन भी बन गए। वैसे तो कृष्णा ने अपना स्वर्ण कोरोना वॉरियर्स को समर्पित किया है, लेकिन वह अपने पिता के लिए स्वर्ण जीतना चाहते थे। उनके पिता उन्हें खिलाड़ी बनाने के लिए 24 घंटे में महज साढ़े तीन घंटे सोए। वह सुबह चार बजे से पैसे कमाने के लिए लोगों को फिटनेस की ट्रेनिंग देते थे। पिता चाहते थे कि वह स्वर्ण जीतें। दरअसल जकार्ता एशियाई खेलों के सेमीफाइनल में हारने का कृष्णा को बेहद दुख था। वह किसी भी कीमत पर यह सेमीफाइनल हारना नहीं चाहते थे। उन्होंने इस कड़वी याद को धो दिया है। यही वजह है कि अंतिम अंक पर उन्होंने शटल को मुड़कर भी नहीं देखा और सीधे कोच गौरव खन्ना की गोद में छलांग लगा दी।
कृष्णा खिलाड़ियों के परिवार से हैं। उनके पिता जूडो, ताईक्वांडो, बेसबॉल, सॉफ्टबॉल के खिलाड़ी रहे हैं। उनके चाचा फुटबॉल और दोनों बुआ भी खिलाड़ी रहे हैं। पिता फिजिकल ट्रेनर हैं। यही कारण है कि उन्होंने बचपन से ही खेलों को अपना लिया। 10 साल की उम्र में उनके पिता घर के सामने मैदान में गड्ढा खुदवाकर उन्हें लंबी, त्रिकूद और ऊंची कूद करवाने लगे। कृष्णा को लंबी कूद में महारत हासिल है। यही कारण है कि बैडमिंटन कोर्ट पर उछलकर स्मैश मारना उन्हें अच्छा लगता है।