अविनाश साबले ने इस इंतजार को खत्म कर दिया। यह हांगझोऊ एशियाई खेलों में एथलेटिक्स यानी ट्रैक एंड फील्ड में भारत का चौथा पदक है। इससे पहले किरण बालियान ने महिलाओं के शॉटपुट में कांस्य, पुरुषों के 10 हजार मीटर रेस में कार्तिक कुमार ने रजत और गुलवीर सिंह ने कांस्य जीता था।
अविनाश ने 8:19:50 का समय लेकर स्वर्ण अपने नाम किया। हालांकि, जो कारनामा उन्होंने आखिरी 100 मीटर में किया, वह शायद ही पहले इन खेलों के इतिहास में देखने को मिला था। 8:19:50 का समय एशियाई खेलों का विश्व रिकॉर्ड भी बन गया है।
अविनाश राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में तीन हजार मीटर स्टीपलचेज (पुरुष) में भारत के पहले पदकवीर हैं। 2022 में बर्मिंघम में उन्होंने रजत पदक जीता था। वहीं, एशियाई खेलों में पुरुषों के तीन हजार स्टीपलचेज में वह भारत के पहले स्वर्ण पदक विजेता एथलीट हैं। उन्होंने आखिरी 100 मीटर में दूसरे स्थान पर रहने वाले एथलीट से 4.25 सेकंड के अंतर से जीत हासिल की।
पुरुषों के तीन हजार मीटर स्टीपलचेज में इससे पहले 1951 दिल्ली एशियाई खेलों में अजीत सिंह ने कांस्य, 1954 मनीला एशियाई खेलों में दालू राम ने कांस्य, 1970 बैंकॉक एशियाई खेलों में गुरमेज सिंह ने कांस्य, 1974 तेहरान एशियाई खेलों में गुरमेज सिंह ने रजत, 1978 बैंकॉक एशियाई खेलों में गोपाल सैनी ने रजत, 1982 दिल्ली एशियाई खेलों में गोपाल सैनी ने रजत, 1990 बीजिंग एशियाई खेलों में दीना राम ने रजत, 2014 इंचियोन एशियाई खेलों में नवीम कुमार ने कांस्य जीता था। अब अविनाश साबले नौवें पदकवीर हैं। हालांकि, यह तीन हजार मीटर स्टीपलचेज में भारत का पहला स्वर्ण है।
कैसे खेला जाता है स्टीपलचेज और सबसे सफल देश
पुरुषों के तीन हजार मीटर स्टीपलचेज में सबसे सफल देश जापान है। उसने 10 स्वर्ण जीते हैं। वहीं, कतर, बहरीन और पाकिस्तान ने दो-दो स्वर्ण जीते हैं। भारत और ईरान को एक-एक स्वर्ण मिला है। 3000 मीटर स्टीपलचेज भी एक स्टैंडआउट इवेंट है। स्टार्टिंग गन की आवाज के साथ ही इसमें कई प्रतिभागी एक साथ दौड़ना शुरू करते हैं। 400 मीटर ट्रैक के आसपास लैप को पूरा करते हुए 28 सामान्य हर्डल और सात पानी के हर्डल को पार करते हैं।
रोज छह किलोमीटर दौड़ कर जाते थे स्कूल
अविनाश का जन्म साल 1994 में एक किसान परिवार में हुए था। उनके गांव में स्कूल बस नहीं चलती थी। ऐसे में अविनाश को रोज छह किलोमीटर दौड़ कर स्कूल जाना पड़ता था। उस समय उन्हें नहीं पता था कि उनकी यह आदत उन्हें एशियाई खेलों में पदक दिलाएगी, लेकिन अपनी पढ़ाई के लिए वो रोज छह किलोमीटर दोड़ते थे। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद अविनाश का चयन भारतीय सेना में हो गया। यहां से उनके लिए चीजें आसान हो गईं, लेकिन अब नई चुनौतियां उनके सामने थीं।
सिर्फ 18 साल की उम्र में अविनाश सेना का हिस्सा बने और उन्हें सियाचिन ग्लेशियर में तैनात कर दिया गया। 2013-14 तक सियाचिन में रहने के बाद रास्थान के रेगिस्तानी इलाकों में उन्हें भेज दिया गया। इसके बाद वो सिक्किम में तैनात रहे। 2017 में सेना के कोच ने उन्हें स्टीपलचेज में दोड़ने की सलाह दी और एक साल बाद ही उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसके बाद वो नौ बार ऐसा कर चुके हैं। अब एशियाई खेलों में पुरुषों के तीन हजार मीटर स्टीपलचेज में पहला स्वर्ण जीतकर उन्होंने इतिहास रचा है। पेरिस ओलंपिक में भी उनसे पदक की आस बढ़ गई है।