पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। उसी समय प्रागज्योतिषपुर नामक राज्य का राजा एक दैत्य नरकासुर (जिसे भौमासुर भी कहा जाता है) था। उसने अपनी दैत्य शक्तियों से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया था व संतो और स्त्रियों पर भी वह अत्याचार करने लगा। इसलिए एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र भगवान कृष्ण के पास पहुंचे और उनसे प्रार्थना की,'हे कृष्ण। नरकासुर ने तीनों लोकों को अपने अधिकार में कर लिया है। उसने वरुण का छत्र, अदिति के कुंडल और देवताओं की मणि छीन ली है। उसने सुंदर कन्याओं का हरण कर लिया है। उसके अत्याचार के कारण देवतागण, मनुष्य और सभी ऋषि-मुनि त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। 'रक्षा कीजिए प्रभु।'
भगवान कृष्ण ने इंद्रदेव की प्रार्थना स्वीकार कर ली। किंतु नरकासुर को वरदान था कि वह किसी स्त्री के हाथों से ही मारा जाएगा, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा से इसके लिए सहायता मांगी, जिसके बाद वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के 6 पुत्रों- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार कर दिया। मुर दैत्य का वध हो जाने का समाचार जैसे ही नरकासुर ने सुना वह अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर भगवान कृष्ण से युद्ध करने के लिए चल पड़ा। नरकासुर के स्त्री के हाथों से मरने का श्राप मिला था इसलिए भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बनाया और उनकी सहायता से नरकासुर का अंत कर दिया। जिस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का अंत किया था, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि थी, इसलिए इस दिन को नरकचतुर्दशी भी कहा जाता है।
भगवान कृष्ण ने देवताओं, ऋषि-मुनियों और पृथ्वी लोक के सभी मनुष्यों की नरकासुर से रक्षा की थी व उन सोलह हजार कन्याओं को नरकासुर के बंधन से मुक्त कराया था, इसलिए दीप जलाकर उत्सव मनाया जाता है।