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Narad Jayanti 2022 Date: आज है नारद जयंती? जानें नारद मुनि के जन्म से जुड़ी खास बातें

Tue, 17 May 2022 12:52 PM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजला, नई दिल्ली
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कब है नारद जयंती? जानें इसका धार्मिक महत्व - फोटो : Facebook
Narada Jayanti 2022 Date: हिंदू कैलेंडर के अनुसार, नारद जयंती हर साल कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर मनाई जाती है। इस साल नारद जयंती 17 मई 2022, दिन मंगलवार को है। नारदजी विष्णु भगवान के परम भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद मुनि विभिन्न लोकों में यात्रा करते थे, जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल का समावेश होता था। ताकि देवी-देवताओं तक संदेश और सूचना का संचार किया जा सके। नारद मुनि के हाथ में हमेशा वीणा मौजूद रहता है। उन्होंने गायन के माध्यम से संदेश देने के लिए अपनी वीणा का उपयोग किया। देवर्षि नारद व्यासजी, वाल्मीकि तथा परम ज्ञानी शुकदेव जी के गुरु माने जाते हैं। कहा जाता है कि नारद मुनि सच्चे सहायक के रूप में हमेशा सच्चे और निर्दोष लोगों की पुकार श्री हरि तक पहुंचाते थे। इन्होंने देवताओं के साथ-साथ असुरों का भी सही मार्गदर्शन किया। यही वजह है कि सभी लोकों में उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। आइए जानते हैं आज नारद मुनि की जन्म कथा... 
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कब है नारद जयंती? जानें इसका धार्मिक महत्व - फोटो : Facebook
नारद मुनि जन्म कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि पूर्व कल्प में नारद 'उपबर्हण' नाम के एक गन्धर्व थे। एक बार भगवान ब्रह्मा ने उपबर्हण को उनके अशिष्ट आचरण के कारण शूद्र योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्राप के फलस्वरूप वह 'शूद्रादासी' के पुत्र हुए। बचपन से ही साधु-संतों के साथ रहने के कारण इस बालक के चित्त में रजोगुण और तमोगुण को नाश करने वाली भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया। निरंतर श्री नारायण की भक्ति करते हुए उन्हें एक दिन भगवान की एक झलक दिखाई दी। ये बालक नारायण के उस स्वरुप को ह्रदय में समाहित करके बार-बार दर्शन करने की चेष्टा करने लगा, परन्तु उसे पुनः नहीं देख सका।
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कब है नारद जयंती? जानें इसका धार्मिक महत्व - फोटो : Twitter- NaradTwits
लेकिन उन्हें अचानक से अदृश्य शक्ति की आवाज सुनाई दी- ''हे दासीपुत्र ! अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा, लेकिन अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद हो जाओगे''। एक सहस्त्र चतुर्युगी बीत जाने पर ब्रह्मा जागे और उन्होंने सृष्टि करने की इच्छा की, तब उनकी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मानस पुत्र के रूप में नारदजी अवतीर्ण हुए और ब्रह्माजी के मानस पुत्र कहलाए। 

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कब है नारद जयंती? जानें इसका धार्मिक महत्व - फोटो : Facebook
तभी से श्री नारायण के वरदान से नारद मुनि वैकुण्ठ सहित तीनों लोकों में बिना किसी रोक-टोक के विचरण करने लगे। नारद मुनि को अजर-अमर माना गया है। माना जाता है कि वीणा पर तान छेड़कर प्रभु की लीलाओं का गान करते हुए ये ब्रह्ममुहूर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं।
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कब है नारद जयंती? जानें इसका धार्मिक महत्व - फोटो : Facebook
वहीं रामायण के एक प्रसंग के अनुसार कहा जाता है कि नारद मुनि के श्राप के कारण ही त्रेता युग में भगवान राम को माता सीता से वियोग सहना पड़ा था। नारद मुनि को अहंकार हो गया था कि उनकी नारायण भक्ति और ब्रह्मचर्य को कामदेव भी भंग नहीं कर सके। तब भगवान विष्णु ने उनका अहंकार दूर करने के लिए अपनी माया से एक सुन्दर नगर का निर्माण किया, जहां राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया जा रहा था। तभी नारद मुनि भी वहां पहुंच गए और राजकुमारी को देखते ही उस पर मोहित हो गए। उस राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा लेकर उन्होंने भगवान विष्णु से उनके जैसा सुन्दर रूप मांगा।
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कब है नारद जयंती? जानें इसका धार्मिक महत्व - फोटो : Instagram
नारद भगवान विष्णु से सुन्दर रूप लेकर राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे। वहां पहुंचते ही उनका चेहरा बन्दर जैसा हो गया। ऐसा रूप देखकर राजकुमारी को नारदमुनि पर बहुत क्रोध आया और तत्पश्चात भगवान विष्णु राजा के रूप में आए और राजकुमारी को लेकर चले गए। इस बात से क्रोधित होकर नारद जी भगवान विष्णु के पास गए और श्राप दे दिया कि जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा। हालांकि माया का प्रभाव हटने पर नारद जी को बहुत दुख हुआ तो उन्होंने भगवान से क्षमा-याचना की लेकिन तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि ये सब माया का प्रभाव था। इसमें आपका कोई दोष नहीं है।
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